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Rigveda / 1 / 78 / 3

तमु॑ त्वा वाज॒सात॑ममङ्गिर॒स्वद्ध॑वामहे। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 78 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : तम्। ऊँ॒ इति॑। त्वा॒। वा॒ज॒ऽसात॑मम्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ह॒वा॒म॒हे॒। द्यु॒म्नैः। अ॒भि। प्र। नो॒नु॒मः॒ ॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (द्युम्नैः) पुण्यरूपी कीर्तियों के साथ जिस (वाजसातमम्) अतिप्रशंसित बोधों से युक्त विद्वान् की और (त्वा) आपकी हम लोग (हवामहे) स्तुति करें (उ) अच्छे प्रकार (अङ्गिरस्वत्) प्रशंसित प्राण के समान (अभि) सब ओर से (प्र णोनुमः) सत्कार करते हैं सो तुम (तम्) उसी की स्तुति और प्रणाम किया करो ॥ ३ ॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग विद्वान् को उक्त प्रकार के सत्कार से सन्तुष्ट करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करो ॥ ३ ॥