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Rigveda / 1 / 80 / 10

इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ तवि॑षीं॒ निर॑ह॒न्त्सह॑सा॒ सहः॑। म॒हत्तद॑स्य॒ पौंस्यं॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑सृज॒दर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 80 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर भी पूर्वोक्त सभाध्यक्ष के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : इन्द्रः॑। वृ॒त्रस्य॑। तवि॑षीम्। निः। अ॒ह॒न्। सह॑सा। सहः॑। म॒हत्। तत्। अ॒स्य॒। पौंस्य॑म्। वृ॒त्रम्। ज॒घ॒न्वा॒न्। अ॒सृ॒ज॒त्। अर्च॑न्। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

पदार्थ : जो (इन्द्रः) सभाध्यक्ष विद्युत्स्वरूप सूर्य्य (वृत्रम्) मेघ को नष्ट करने के समान शत्रु को (जघन्वान्) मारता हुआ निरन्तर हनन करता है तथा जो (सहसा) बल से सूर्य जैसे (वृत्रस्य) मेघ के बल को वैसे शत्रु के (तविषीम्) बल को (निरहन्) निरन्तर हनन करता और (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) सत्कार करता हुआ सुख को (असृजत्) उत्पन्न करता है (तत्) वही (अस्य) इस का (महत्) बड़ा (पौंस्यम्) पुरुषार्थरूप बल के (सहः) सहन का हेतु है ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अत्यन्त बल और तेज से सबका आकर्षण और प्रकाश करता है, वैसे सभाध्यक्ष आदि को उचित है कि अपने अत्यन्त बल से शुभ गुणों के आकर्षण और न्याय के प्रकाश से राज्य की शिक्षा करें ॥ १० ॥