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Rigveda / 1 / 80 / 15

न॒हि नु याद॑धी॒मसीन्द्रं॒ को वी॒र्या॑ प॒रः। तस्मि॑न्नृ॒म्णमु॒त क्रतुं॑ दे॒वा ओजां॑सि॒ सं द॑धु॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 80 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब ईश्वर और परम विद्वान् को प्राप्त होकर विद्वान् लोग क्या-क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : न॒हि। नु। यात्। अ॒धि॒ऽइ॒मसि॑। इन्द्र॑म्। कः। वी॒र्या॑। प॒रः। तस्मि॑न्। नृ॒म्णम्। उ॒त। क्रतु॑म्। दे॒वाः। ओजां॑सि। सम्। द॒धुः॒। अर्च॑न्। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

पदार्थ : जो (परः) उत्तमगुणयुक्त राजा (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) अनुकूलता से सत्कार करता हुआ वर्त्तता है, जिस राज्य में (देवाः) दिव्यगुणयुक्त विद्वान् लोग (नृम्णम्) धन को (क्रतुम्) और बुद्धि वा पुरुषार्थ को (उत) और भी (ओजांसि) शरीर, आत्मा और मन के पराक्रमों को (संदधुः) धारण करते हैं तथा जिस परमेश्वर को प्राप्त होकर हम लोग (वीर्य्या) विद्या आदि वीर्यों को (अधीमसि) प्राप्त होवें, उस (इन्द्रम्) अनन्त पराक्रमी जगदीश्वर वा पूर्ण वीर्य्ययुक्त राजा को प्राप्त होकर (कः) कौन मनुष्य धन को (नु) शीघ्र (नहि) (यात्) प्राप्त हो, उस राज्य में कौन पुरुष धन को तथा बुद्धि वा पुरुषार्थ वा बलों को शीघ्र नहीं धारण करता ॥ १५ ॥

भावार्थ : कोई भी मनुष्य परमेश्वर वा परम विद्वान् की प्राप्ति के विना उत्तम विद्या और श्रेष्ठ सामर्थ्य को नहीं प्राप्त हो सकता, इस हेतु से इनका सदा आश्रय करना चाहिये ॥ १५ ॥