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Rigveda / 1 / 83 / 3

अधि॒ द्वयो॑रदधा उ॒क्थ्यं१॒॑ वचो॑ य॒तस्रु॑चा मिथु॒ना या स॑प॒र्यतः॑। असं॑यत्तो व्र॒ते ते॑ क्षेति॒ पुष्य॑ति भ॒द्रा श॒क्तिर्यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 83 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : अधि॑। द्वयोः॑। अ॒द॒धाः॒। उ॒क्थ्य॑म्। वचः॑। य॒तऽस्रु॑चा। मि॒थु॒ना। या। स॒प॒र्यतः॑। अस॑म्ऽयत्तः। व्र॒ते। ते॒। क्षे॒ति॒। पुष्य॑ति। भ॒द्रा। श॒क्तिः। यज॑मानाय। सु॒न्व॒ते ॥

पदार्थ : हे मनुष्य ! जैसे (या) जो (यतस्रुचा) साधनोपसाधनयुक्त पढ़ाने और उपदेश करनेहारे (मिथुना) दोनों मिलके (द्वयोः) अपना और पराया कल्याण करके जो (उक्थ्यम्) प्रशंसा के योग्य (वचः) वचन को (सपर्यतः) सेवते हैं, वैसे इसका तू (अदधाः) धारण कर। जो (असंयत्तः) अजितेन्द्रिय भी (ते) तेरे (व्रते) सत्यभाषणादि नियम पालन में (क्षेति) निवास करता है, उसमें (भद्रा) कल्याण करनेहारी (शक्तिः) सामर्थ्य (क्षेति) बसती है और वह (पुष्यति) पुष्ट होता है, तब (सुन्वते) ऐश्वर्यप्राप्ति होनेवाले (यजमानाय) सबको सुखके दाता के लिये निरन्तर सुख कैसे न बढ़े ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य परोपकारी बुद्धि से सबके शरीर और आत्मा के मध्य पुष्टि और विद्याबल को उत्पन्न कर विरोध छोड़के धर्मयुक्त व्यवहार को सेवन करके निरन्तर सब मनुष्यों को सत्यव्यवहार में प्रवृत्त करते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥