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Rigveda / 1 / 84 / 5

इन्द्रा॑य नू॒नम॑र्चतो॒क्थानि॑ च ब्रवीतन। सु॒ता अ॑मत्सु॒रिन्द॑वो॒ ज्येष्ठं॑ नमस्यता॒ सहः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 84 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निच्रृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर किस प्रकार के सभाध्यक्ष का सत्कार करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑य। नू॒नम्। अ॒र्च॒त॒। उ॒क्थानि॑। च॒। ब्र॒वी॒त॒न॒। सु॒ताः। अ॒म॒त्सुः॒। इन्द॑वः। ज्येष्ठ॑म्। न॒म॒स्य॒त॒। सहः॑ ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम जिसको (सुताः) सिद्ध (इन्दवः) उत्तम रसीले पदार्थ (अमत्सुः) आनन्दित करें, जिसको (ज्येष्ठम्) उत्तम (सहः) बल प्राप्त हो उस (इन्द्राय) सभाध्यक्ष को (नमस्यत) नमस्कार करो और उसको मुख्य कामों में युक्त करके (नूनम्) निश्चय से (अर्चत) सत्कार करो (उक्थानि) अच्छे-अच्छे वचनों से (ब्रवीतन) उपदेश करो, उससे सत्कारों को (च) भी प्राप्त हो ॥ ५ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को योग्य है कि जो सबका सत्कार करे, शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होके परोपकारी हो, उसको छोड़ के अन्य को सेनापति आदि अधिकारों में कभी स्थापन न करें ॥ ५ ॥