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Rigveda / 1 / 84 / 11

ता अ॑स्य पृशना॒युवः॒ सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः। प्रि॒या इन्द्र॑स्य धे॒नवो॒ वज्रं॑ हिन्वन्ति॒ साय॑कं॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 84 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदास्तारपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब फिर उससे सम्बन्धित गुणों का उपदेश किया है ॥

पदपाठ : ताः। अ॒स्य॒। पृ॒श॒न॒ऽयुवः॑। सोम॑म्। श्री॒ण॒न्ति॒। पृश्न॑यः। प्रि॒याः। इन्द्र॑स्य। धे॒नवः॑। वज्र॑म्। हि॒न्व॒न्ति॒। साय॑कम्। वस्वीः॑। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग (अस्य) इस (इन्द्रस्य) सूर्य वा सेना के अध्यक्ष की (पृशनायुवः) अपने को स्पर्श करनेवाली अर्थात् उलट-पलट अपना स्पर्श करना चाहती (पृश्नयः) स्पर्श करती और (प्रियाः) प्रसन्न करनेहारी (धेनवः) किरण वा गौ वा वाणी (सोमम्) ओषधि रस वा ऐश्वर्य को (श्रीणन्ति) सिद्ध करती और (सायकम्) दुर्गुणों को क्षय करनेहारे ताप वा शस्त्रसमूह को (हिन्वन्ति) प्रेरणा देती है (वस्वीः) और वे पृथिवी से सम्बन्ध करनेवाली (स्वराज्यम्) अपने राज्य के (अनु) अनुकूल होती है, उनको प्राप्त होओ ॥ ११ ॥

भावार्थ : जैसे गोपाल की गौ जल रस को पी, घास को खा, निज सुख को बढ़ाकर, औरों के आनन्द को बढ़ाती है, वैसे ही सेनाध्यक्ष की सेना और सूर्य की किरण औषधियों से वैद्यकशास्त्र के अनुकूल वा उत्पन्न हुए परिपक्व रस को पीकर विजय और प्रकाश को करके आनन्द कराती हैं ॥ ११ ॥