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Rigveda / 1 / 84 / 18

को अ॒ग्निमी॑ट्टे ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ स्रु॒चा य॑जाता ऋ॒तुभि॑र्ध्रु॒वेभिः॑। कस्मै॑ दे॒वा आ व॑हाना॒शु होम॒ को मं॑सते वी॒तिहो॑त्रः सुदे॒वः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 84 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर भी उक्त विषय का उपदेश किया है ॥

पदपाठ : कः। अ॒ग्निम्। ई॒ट्टे॒। ह॒विषा॑। घृ॒तेन॑। स्रु॒चा। य॒जा॒तै॒। ऋ॒तुऽभिः॑। ध्रु॒वेभिः॑। कस्मै॑। दे॒वाः। आ। व॒हा॒न्। आ॒शु। होम॑। कः। मं॒स॒ते॒। वी॒तिऽहो॑त्रः। सु॒ऽदे॒वः ॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! (कः) कौन (वीतिहोत्रः) विज्ञान और श्रेष्ठ क्रियायुक्त पुरुष (हविषाः) विचार और (घृतेन) घी से (अग्निम्) अग्नि को (ईट्टे) ऐश्वर्य प्राप्ति का हेतु करता है, (कः) कौन (स्रुचा) कर्म से (ध्रुवेभिः) निश्चल (ऋतुभिः) वसन्तादि ऋतुओं में (यजातै) ज्ञान और क्रियायज्ञ को करे, (देवाः) विद्वान् लोग (कस्मै) किसके लिये (होम) ग्रहण वा दान को (आशु) शीघ्र (आवहान्) प्राप्त करावें, कौन (सुदेवः) उत्तम विद्वान् इस सबको (मंसते) जानता है, इस का उत्तर कहिये ॥ १८ ॥

भावार्थ : हे विद्वन् ! किस साधन वा कर्म से अग्निविद्या को प्राप्त हों? और किससे क्रियारूप यज्ञ सिद्ध होवे? किस प्रयोजन के लिये विद्वान् लोग यज्ञ का विस्तार करते हैं? ॥ १८ ॥