Rigveda / 1 / 85 / 4
वि ये भ्राज॑न्ते॒ सुम॑खास ऋ॒ष्टिभिः॑ प्रच्या॒वय॑न्तो॒ अच्यु॑ता चि॒दोज॑सा। म॒नो॒जुवो॒ यन्म॑रुतो॒ रथे॒ष्वा वृष॑व्रातासः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 85 | Mantra No : 4
In English:
Seer : gotamo raahuugaNaH | Devta : marutaH | Metre : viraaDjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vi ye bhraajante sumakhaasa RRIShTibhiH prachyaavayanto achyutaa chidojasaa. manojuvo yanmaruto ratheShvaa vRRiShavraataasaH pRRiShatiirayugdhvam .
Component Words : vi. ye. bhraajante. su.amakhaasaH. RRIShTi.abhiH. pra.achyaavayantaH. achyutaa. chit. ojasaa. manaH.ajuvaH. yat. marutaH. ratheShu. aa. vRRiSha.avraataasaH. pRRiShatiiH. ayugdhvam .
In Hindi:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : मरुतः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर वे क्या-क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥
पदपाठ : वि। ये। भ्राज॑न्ते। सुऽम॑खासः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। प्र॒ऽच्या॒वय॑न्तः। अच्यु॑ता। चि॒त्। ओज॑सा। म॒नः॒ऽजुवः॑। यत्। म॒रु॒तः॒। रथे॑षु। आ। वृष॑ऽव्रातासः। पृष॑तीः। अयु॑ग्ध्वम् ॥
पदार्थ : हे प्रजा और सभा के मनुष्यो ! (ये) जो (मनोजुवः) मन के समान वेगवाले (मरुतः) वायुओं के (चित्) समान (वृषव्रातासः) शस्त्र और अस्त्रों को शत्रुओं के ऊपर वर्षानेवाले मनुष्यों से युक्त (सुमखासः) उत्तम शिल्पविद्या सम्बन्धी वा संग्रामरूप क्रियाओं के करनेहारे (ऋष्टिभिः) यन्त्र कलाओं को चलानेवाले दण्डों और (अच्युता) अक्षय (ओजसा) बल पराक्रम युक्त सेना से शत्रु की सेनाओं को (प्रच्यावयन्तः) नष्ट-भ्रष्ट करते हुए (व्याभ्राजन्ते) अच्छे प्रकार शोभायमान होते हैं, उनके साथ (यत्) जिन (रथेषु) रथों में (पृषतीः) वायु से युक्त जलों को (अयुग्ध्वम्) संयुक्त करो, उनसे शत्रुओं को जीतो ॥ ४ ॥
भावार्थ : मनुष्यो को उचित है कि मन के समान वेगयुक्त विमानादि यानों में जल, अग्नि और वायु को संयुक्त कर, उसमें बैठ के, सर्वत्र भूगोल में जा-आके शत्रुओं को जीतकर, प्रजा को उत्तम रीति से पाल के, शिल्पविद्या कर्मों को बढ़ा के सबका उपकार किया करें ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : मरुतः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्ते किं किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : वि। ये। भ्राज॑न्ते। सुऽम॑खासः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। प्र॒ऽच्या॒वय॑न्तः। अच्यु॑ता। चि॒त्। ओज॑सा। म॒नः॒ऽजुवः॑। यत्। म॒रु॒तः॒। रथे॑षु। आ। वृष॑ऽव्रातासः। पृष॑तीः। अयु॑ग्ध्वम् ॥
पदार्थ : (वि) विशेषार्थे (ये) सभाद्यध्यक्षादयः (भ्राजन्ते) प्रकाशन्ते (सुमखासः) शोभनाः शिल्पसंबन्धिनः संग्रामा यज्ञा येषान्ते (ऋष्टिभिः) यन्त्रचालनार्थैर्गमनागमननिमित्तैर्दण्डैः (प्रच्यावयन्तः) विमानादीनि यानानि प्रचालयन्तः सन्तः (अच्युता) क्षेतुमशक्येन (चित्) इव (ओजसा) बलयुक्तेन सैन्येन सह वर्त्तमानाः (मनोजुवः) मनोवद्गतयः (यत्) याः (मरुतः) वायवः (रथेषु) विमानादियानेषु (आ) समन्तात् (वृषव्रातासः) वृषाः शस्त्रास्त्रवर्षयितारो व्रातासो मनुष्या येषान्ते (पृषतीः) मरुत्सम्बन्धिनीरपः (अयुग्ध्वम्) योजयत ॥ ४ ॥
अन्वय : हे प्रजासभामनुष्या ! ये मनोजुवो मरुतश्चिदिव वृषव्रातासः सुमखास ऋष्टिभिरच्युतौजसा शत्रुसैन्यानि प्रच्यावयन्तः सन्तो व्याभ्राजन्ते तैः सह येषु रथेषु यत् पृषतीरयुग्ध्वं तैः शत्रून् विजयध्वम् ॥ ४ ॥
भावार्थ : मनुष्यैर्मनोजवेषु विमानादियानेषु जलाग्निवायून् संप्रयुज्य तत्र स्थित्वा सर्वत्र भूगोले गत्वागत्य शत्रून् विजित्य प्रजाः सम्पाल्य शिल्पविद्याकार्याणि प्रवृध्य सर्वोपकाराः कर्त्तव्याः ॥ ४ ॥