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Rigveda / 1 / 85 / 7

ते॑ऽवर्धन्त॒ स्वत॑वसो महित्व॒ना नाकं॑ त॒स्थुरु॒रु च॑क्रिरे॒ सदः॑। विष्णु॒र्यद्धाव॒द्वृष॑णं मद॒च्युतं॒ वयो॒ न सी॑द॒न्नधि॑ ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 85 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : ते। अ॒व॒र्ध॒न्त॒। स्वऽत॑वसः। म॒हि॒ऽत्व॒ना। आ। नाक॑म्। त॒स्थुः। उ॒रु। च॒क्रि॒रे॒। सदः॑। विष्णुः॑। यत्। ह॒। आव॑त्। वृष॑णम्। म॒द॒ऽच्युत॑म्। वयः॑। न। सी॒द॒न्। अधि॑। ब॒र्हिषि॑। प्रि॒ये ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (विष्णुः) सूर्यवत् शिल्पविद्या में निपुण मनुष्य (प्रिये) अत्यन्त सुन्दर (बर्हिषि) आकाश में (वृषणम्) अग्नि-जल के वर्षायुक्त विमान के (अधिसीदन्) ऊपर बैठ के (वयो न) जैसे पक्षी आकाश में उड़ते और भूमि में आते हैं, वैसे (यत्) जिस (मदच्युतम्) हर्ष को प्राप्त दुष्टों को रोकनेहारे मनुष्यों की (आवत्) रक्षा करता है, उसको जो (स्वतवसः) स्वकीय बलयुक्त मनुष्य प्राप्त होते हैं (ते ह) वे ही (महित्वना) महिमा से (अवर्धन्त) बढ़ते हैं और जो विमानादि यानों में (आतस्थुः) बैठ के (उरु) बहुत सुखसाधक (सदः) स्थान को जाते-आते हैं, वे (नाकम्) विशेष सुख (चक्रिरे) करते हैं ॥ ७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पक्षी आकाश में सुखपूर्वक जाके आते हैं, वैसे ही साङ्गोपाङ्ग शिल्पविद्या को साक्षात् करके उससे उत्तम यानादि सिद्ध करके अच्छी सामग्री को रख के बढ़ाते हैं, वे ही उत्तम प्रतिष्ठा और धनों को प्राप्त होकर नित्य बढ़ा करते हैं ॥ ७ ॥