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Rigveda / 1 / 86 / 1

मरु॑तो॒ यस्य॒ हि क्षये॑ पा॒था दि॒वो वि॑महसः। स सु॑गो॒पात॑मो॒ जनः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 86 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : मरुतः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह गृहस्थ कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : मरु॑तः। यस्य॑। हि। क्षये॑। पा॒थ। दि॒वः। वि॒ऽम॒ह॒सः॒। सः। सु॒ऽगो॒पात॑मः। जनः॑ ॥

पदार्थ : हे (विमहसः) नाना प्रकार पूजनीय कर्मों के कर्त्ता ! (दिवः) विद्यान्यायप्रकाशक तुम लोग (मरुतः) वायु के समान विद्वान् जन (यस्य) जिसके (क्षये) घर में (पाथ) रक्षक हो (सः हि) वही (सुगोपातमः) अच्छे प्रकार (जनः) मनुष्य होवे ॥ १ ॥

भावार्थ : जैसे प्राण के विना शरीरादि का रक्षण नहीं हो सकता, वैसे सत्योपदेशकर्त्ता के विना प्रजा की रक्षा नहीं होती ॥ १ ॥