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Rigveda / 1 / 89 / 10

अदि॑ति॒र्द्यौरदि॑तिर॒न्तरि॑क्ष॒मदि॑तिर्मा॒ता स पि॒ता स पु॒त्रः। विश्वे॑ दे॒वा अदि॑तिः॒ प़ञ्च॒ जना॒ अदि॑तिर्जा॒तमदि॑ति॒र्जनि॑त्वम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 89 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब इन विद्वानों के संग से क्या-क्या सेवने और जानने योग्य है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : अदि॑तिः। द्यौः। अदि॑तिः। अ॒न्तरि॑क्षम्। अदि॑तिः। मा॒ता। सः। पि॒ता। सः। पु॒त्रः। विश्वे॑। दे॒वाः। अदि॑तिः। पञ्च॑। जनाः॑। अदि॑तिः। जा॒तम्। अदि॑तिः। जनि॑ऽत्वम् ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुमको चाहिये कि (द्यौः) प्रकाशयुक्त परमेश्वर वा सूर्य्य आदि प्रकाशमय पदार्थ (अदितिः) अविनाशी (अन्तरिक्षम्) आकाश (अदितिः) अविनाशी (माता) माँ वा विद्या (अदितिः) अविनाशी (सः) वह (पिता) उत्पन्न करने वा पालनेहारा पिता (सः) वह (पुत्रः) औरस अर्थात् निज विवाहित पुरुष से उत्पन्न वा क्षेत्रज अर्थात् नियोग करके दूसरे से क्षेत्र में हुआ विद्या से उत्पन्न पुत्र (अदितिः) अविनाशी है तथा (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् वा दिव्य गुणवाले पदार्थ (अदितिः) अविनाशी हैं (पञ्च) पाँचों ज्ञानेन्द्रिय और (जनाः) जीव भी (अदितिः) अविनाशी हैं, इस प्रकार जो कुछ (जातम्) उत्पन्न हुआ वा (जनित्वम्) होनेहारा है, वह सब (अदितिः) अविनाशी अर्थात् नित्य है ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमाणुरूप वा प्रवाहरूप से सब पदार्थ नित्य मानकर दिव् आदि पदार्थों की अदिति संज्ञा की है। जहाँ-जहाँ वेद में अदिति शब्द पढ़ा है, वहाँ-वहाँ प्रकरण की अनुकूलता से दिव् आदि पदार्थों में से जिस-जिस की योग्यता हो उस-उस का ग्रहण करना चाहिये। ईश्वर, जीव और प्रकृति अर्थात् जगत् का कारण इनके अविनाशी होने से उसकी भी अदिति संज्ञा है ॥ १० ॥ इस सूक्त में विद्वान्, विद्यार्थी और प्रकाशमय पदार्थों का विश्वेदेव पद के अन्तर्गत होने से वर्णन किया है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, ऐसा जानना चाहिये ॥