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Rigveda / 1 / 91 / 2

त्वं सो॑म॒ क्रतु॑भिः सु॒क्रतु॑र्भू॒स्त्वं दक्षै॑: सु॒दक्षो॑ वि॒श्ववे॑दाः। त्वं वृषा॑ वृष॒त्वेभि॑र्महि॒त्वा द्यु॒म्नेभि॑र्द्यु॒म्न्य॑भवो नृ॒चक्षा॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 91 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वे दोनों कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वम्। सो॒म॒। क्रतु॑ऽभिः। सु॒ऽक्रतुः॑। भूः॒। त्वम्। दक्षैः॑। सु॒ऽदक्षः॑। वि॒श्वऽवे॑दाः। त्वम्। वृषा॑। वृ॒ष॒ऽत्वेभिः॑। म॒हि॒ऽत्वा। द्यु॒म्नेभिः॑। द्यु॒म्नी। अ॒भ॒वः॒। नृ॒ऽचक्षाः॑ ॥ १.९१.२

पदार्थ : हे (सोम) शान्ति गुणयुक्त परमेश्वर वा उत्तम विद्वान् ! जिस कारण (त्वम्) आप (क्रतुभिः) उत्तम बुद्धि कर्मों से (सुक्रतुः) श्रेष्ठ बुद्धिशाली वा श्रेष्ठ काम करनेवाले तथा (दक्षैः) विज्ञान आदि गुणों से (सुदक्षः) अति श्रेष्ठ ज्ञानी (विश्ववेदाः) और सब विद्या पाये हुए (भूः) होते हैं वा जिस कारण (त्वम्) आप (महित्वा) बड़े-बड़े गुणोंवाले होने से (वृषत्वेभिः) विद्यारूपी सुखों की (वृषा) वर्षा और (द्युम्नेभिः) कीर्त्ति और चक्रवर्त्ति आदि राज्य धर्मों से (द्युम्नी) प्रशंसित धनी (नृचक्षाः) मनुष्यों में दर्शनीय (अभवः) होते हो, इससे (त्वम्) आप सबमें उत्तम उत्कर्षयुक्त हूजिये ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे अच्छी रीति से सेवा किया हुआ सोम आदि ओषधियों का समूह बुद्धि, चतुराई, वीर्य और धनों को उत्पन्न कराता है, वैसे ही अच्छी उपासना को प्राप्त हुआ ईश्वर वा अच्छी सेवा को प्राप्त हुआ विद्वान् उक्त कामों को उत्पन्न कराता है ॥ २ ॥