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Samveda/39

अग्ने जरितर्विश्पतिस्तपानो देव रक्षसः। अप्रोषिवान्गृहपते महा असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः॥३९

Veda : Samveda | Mantra No : 39

In Hindi:

ऋषि : भर्गः प्रागाथः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर और राजा का महत्त्व वर्णित किया गया है।

पदपाठ : अग्ने। जरितः। विश्पतिः। तपानः । देव। रक्षसः। अप्रोषिवान् ।अ। प्रोषिवान् । गृहपते। गृह।पते। महान्।असि। दिवः। पायुः। रोणयुः।दुः।ओनयुः।

पदार्थ : प्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे (जरितः) सज्जनों के गुणों के प्रशंसक (अग्ने) परमात्मन् ! आप (विश्पतिः) प्रजापालक हो। हे (देव) ज्योतिर्मय ! आप (रक्षसः) राक्षसी वृत्तिवाले मनुष्यों के (तपानः) सन्तापक हो। हे (गृहपते) ब्रह्माण्डरूप गृह के स्वामिन्! (अप्रोषिवान्) ब्रह्माण्डरूप गृह से कभी प्रवास न करनेवाले, (दिवः पायुः) प्रकाशमान द्युलोक के अथवा प्रकाशमान जीवात्मा के रक्षक, (दुरोणयुः) सबको निवास गृह दिलाना चाहनेवाले आप (महान्) महान् (असि) हो ॥द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (जरितः) परमेश्वर के स्तोता (अग्ने) राष्ट्रनायक राजन् ! आप (विश्पतिः) प्रजाओं के पालक हो। हे (देव) दानादि गुणों से देदीप्यमान राजन् ! आप (रक्षसः) दुष्ट शत्रुओं के (तपानः) सन्तापक हो। हे (गृहपते) राष्ट्र-गृह के स्वामिन् ! (अप्रोषिवान्) राष्ट्र से प्रवास न करनेवाले, (दिवः पायुः) विद्या आदि के प्रकाश के रक्षक, (दुरोणयुः) राष्ट्र-रूप घर की उन्नति चाहनेवाले आप (महान्) महान् (असि) हो ॥५॥इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥५॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर सज्जनों की रक्षा करता हुआ, दुर्जनों को दण्ड देता हुआ सबकी समुन्नति चाहता है, वैसे ही राजा भी प्रजाओं का पालन करता हुआ, दुष्टों का उन्मूलन करता हुआ राष्ट्र को उत्कर्ष की ओर ले जाए ॥५॥