Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/55

देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम्। उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते॥५५

Veda : Samveda | Mantra No : 55

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को प्रेरणा दी जा रही है।

पदपाठ : देवः ।वः। द्रविणोदाः।द्रविणः।दाः। पूर्णाम्। विवष्टु। आसिचम्। आ।सिचम्। उत्। वा। सिञ्चध्वम्। उप। वा। पृणध्वम् । आत्। इत्। वः। देवः। ओहते।१।

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (द्रविणोदाः) धन और बल का दाता (देवः) दिव्यगुणमय परमेश्वर (वः) तुम्हारी (पूर्णाम्) भक्तिरसरूप सोम से परिपूर्ण (आसिचम्) मन रूप स्रुवा की (विवष्टु) कामना करे। तुम (उत् सिञ्चध्वं वा) श्रद्धारस से उस परमेश्वर को स्नान कराओ, (उप पृणध्वं वा) और तृप्त करो। (आत् इत्) तदनन्तर ही (देवः) परमेश्वर (वः) तुम्हें (ओहते) वहन करेगा अर्थात् लक्ष्य पर पहुँचाएगा ॥१॥

भावार्थ : सब उपासक जनों को चाहिए कि प्रेमरस से भरी हुई अपनी मनरूप स्रुवाओं से परमेश्वर को श्रद्धारस से सींचें और तृप्त करें। इस प्रकार सींचा हुआ और तृप्त किया हुआ वह उपासकों को उनके निर्धारित लक्ष्य की ओर ले जाता है ॥१॥