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Samveda/63

आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम्। इडस्पदे नमसा रातहव्य सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्॥६३

Veda : Samveda | Mantra No : 63

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्वः अथवा वामदेव | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में यह कहते हैं कि परमात्मा का सबको ध्यान और पूजन करना चाहिए।

पदपाठ : आ । जुहोत। हविषा। मर्जयध्वम्। नि। होतारम्। गृहपतिम्।गृह।पतिम् । दधिध्वम्। इडः। पदे। नमसा। रातहव्यम्।रात।हव्यम्। सपर्यता। यजतम्। पस्त्यानां। १।

पदार्थ : हे स्तोताओ ! तुम (हविषा) आत्मसमर्पणरूप हवि से (आजुहोत) परमात्माग्नि में अग्निहोत्र करो, (मर्जयध्वम्) अपने आत्मा को शुद्ध और अलंकृत करो। (होतारम्) यज्ञ का फल देनेवाले (गृहपतिम्) शरीररूप घर के रक्षक उस परमात्माग्नि को (निदधिध्वम्) हृदय में धारण करो—अर्थात्, उसका निरन्तर ध्यान करो। (रातहव्यम्) दातव्य सांसारिक वस्तुओं को और सद्गुणों को देनेवाले, (पस्त्यानाम्) प्रजाओं के (यजतम्) पूजनीय उस परमात्माग्नि को (इडः पदे) हृदयरूप यज्ञवेदि-स्थल में (नमसा) नमस्कार द्वारा (सपर्यत) पूजो ॥१॥इस मन्त्र में 'आजुहोत, मर्जयध्वम्, निदधिध्वम्, सपर्यत' इन अनेक क्रियाओं का एक कर्ता कारक से सम्बन्ध होने के कारण दीपक अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : आत्म-कल्याण चाहनेवाले मनुष्यों को अपने आत्मा को परमात्मारूप अग्नि में समर्पित करके आत्मशुद्धि करनी चाहिए ॥१॥