Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/70

इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन। नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि॥७०

Veda : Samveda | Mantra No : 70

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में यज्ञाग्नि के सादृश्य से परमात्माग्नि का विषय वर्णित है।

पदपाठ : इन्धे। राजा।सम्। अर्यः। नमोभिः। यस्य। प्रतीकम्।आहुतम्।आ।हुतम्। घृतेन। नरः। हव्येभिः। ईडते। सबाधः।स।बाधः। आ। अग्निः। अग्रम्। उषसाम्।अशोचि।८।

पदार्थ : प्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (अर्यः) हवि-वहन के कर्म का स्वामी (राजा) वेदि में विराजमान यज्ञाग्नि (नमोभिः) सुगन्धित, मधुर, पुष्टिवर्धक और आरोग्यवर्द्धक हवि के अन्नों से (सम् इन्धे) भली-भाँति प्रदीप्त किया जाता है, (यस्य) जिस यज्ञाग्नि का (प्रतीकम्) ज्वाला-रूप मुख (घृतेन) घृत से (आहुतम्) आहुत होता है। (सबाधः) ऋत्विज (नरः) मनुष्य, उस यज्ञाग्नि का (हव्येभिः) हवियों से (ईडते) सत्कार करते हैं। (अग्निः) वह यज्ञाग्नि (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) सामने (आ अशोचि) चारों ओर यज्ञवेदि में प्रदीप्त किया जाता है ॥द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (अर्यः) सबका स्वामी (राजा) सम्राट् परमात्मा (नमोभिः) नमस्कारों द्वारा (सम् इन्धे) हृदय में भली-भाँति प्रकाशित होता है, (यस्य) जिस परमात्मा का (प्रतीकम्) स्वरूप (घृतेन) तेज से (आहुतम्) व्याप्त है। (सबाधः) बाधाओं से आक्रान्त (नरः) मनुष्य (हव्येभिः) आत्म-समर्पण रूप हवियों से, उस परमात्मा की (ईडते) पूजा करते हैं। (अग्निः) वह परमात्मा (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) आगे (आ अशोचि) उपासकों के हृदय में प्रदीप्त होता है। अभिप्राय यह है कि प्रभात काल में धारणा, ध्यान एवं समाधि के सुगम होने से हृदय में परमेश्वर के तेज का अनुभव सुलभ होता है ॥८॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। यज्ञाग्नि और परमेश्वराग्नि में उपमानोपमेयभाव व्यङ्ग्य है ॥८॥

भावार्थ : जैसे यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को हवियों से प्रदीप्त करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि हृदय में परमात्मा को नमस्कारों द्वारा प्रदीप्त करें ॥८॥