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Samveda/105

अप त्यं वृजिन रिपु स्तेनमग्ने दुराध्यम्। दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम्॥१०५

Veda : Samveda | Mantra No : 105

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वा भारद्वाजः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अगले मन्त्र में रिपुओं को दूर करने की प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : अप। त्यम्। वृजिनम्। रिपुम। स्तेनम्। अग्ने । दुराध्यम्। दुः। आध्यम्। दविष्ठम् । अस्य। सत्पते।सत्।पते। कृधि। सुगम्।सु।गम्।९।

पदार्थ : हे (सत्पते) सज्जनों के पालनकर्ता (अग्ने) पराक्रमशाली परमात्मन्, विद्वान् जन अथवा राजन् ! आप (त्यम्) उस (वृजिनम्) छोड़ने योग्य पाप को, (रिपुम्) कामक्रोधादि षड्रिपुवर्ग को, अथवा बाह्य शत्रु को, (स्तेनम्) चोर को, और (दुर्-आध्यम्) बुरा चिन्तन करनेवाले द्वेषी को (दविष्ठम्) दूर से दूर (अप अस्य) फेंक दीजिए ॥९॥इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥९॥

भावार्थ : पाप विचार या पापीजन, काम-क्रोध आदि आन्तरिक रिपु या बाह्य शत्रु, चोरी के विचार या चोर लोग, दुश्चिन्ताएँ या दुश्चिन्तनकारी मनुष्य, जो भी हम पर आक्रमण करते हैं, उन्हें हम परमात्मा, विद्वान् लोगों और राजा की सहायता से दूर कर दें। सद्विचार और सद्विचारशील लोग सहयोगी बनकर हमारे साथ विचरें ॥९॥