Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/116

यस्ते नून शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मदः। तेन नूनं मदे मदे॥११६

Veda : Samveda | Mantra No : 116

In Hindi:

ऋषि : श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में इन्द्र परमात्मा से याचना की गयी है।

पदपाठ : यः ।ते। नूनम्। शतक्रतो ।शत।कृतो।इन्द्र। द्युम्नितमः। मदः। तेन। नूनम्। मदे। मदेः।२।

पदार्थ : हे (शतक्रतो) बहुत प्रज्ञाओं, कर्मों, यज्ञों और संकल्पोंवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यः) जो (ते) आपका (नूनम्) निश्चय ही (द्युम्नितमः) सबसे अधिक यशोमय (मदः) आनन्द है, (तेन) उससे (नूनम्) आज हमें भी (मदे) आनन्द में (मदेः) मग्न कर दीजिए ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा का आनन्द-रस जिन्होंने चख लिया है, वे उस रस की कीर्ति को गाते नहीं थकते। 'वह रस-रूप है' यह तत्त्ववेत्ताओं का अनुभव है। सबको चाहिए कि उसके रस को प्राप्त कर अपने आपको धन्य करें ॥२॥