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Samveda/129

एन्द्र सानसि रयि सजित्वान सदासहम्। वर्षिष्ठमूतये भर॥१२९

Veda : Samveda | Mantra No : 129

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में इन्द्र से धन की प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : आ। इन्द्र। सानसिम्। रयिम् । सजित्वानम्। स । जित्वानम्। सदासहम्।सदा।सहम्। वर्षिष्ठमम् । ऊतये। भर। ।५।

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली, परम ऐश्वर्य के दाता परमात्मन् और राजन् ! आप (सानसिम्) संभजनीय, (सजित्वानम्) सहोत्पन्न शत्रुओं को जीतनेवाले, (सदासहम्) सदा दुष्ट शत्रुओं का अभिभव करानेवाले और दुःखों को सहन करानेवाले, (वर्षिष्ठम्) अतिशय बढ़े हुए और बढ़ानेवाले (रयिम्) अहिंसा, सत्य, शम, दम आदि दैवी सम्पदा को तथा विद्या, धन, बल, चक्रवर्ती राज्य आदि भौतिक ऐश्वर्य को (ऊतये)) हमारी रक्षा, प्रगति, प्रीति और तृप्ति के लिए (आ भर) प्रदान कीजिए ॥५॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को परमधनी परमात्मा और राजा से याचना करके और अपने पुरुषार्थ द्वारा अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान, शम, दम, तेज तप, क्षमा, धृति आदि दैवी सम्पदा और विद्या, धन, बल, दीर्घायुष्य, पशु, पुत्र, पौत्र, कलत्र, चक्रवर्ती राज्य आदि भौतिक सम्पदा का उपार्जन करना चाहिए ॥५॥