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Samveda/141

अद्य नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम्। परा दुष्वप्न्य सुव॥१४१

Veda : Samveda | Mantra No : 141

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्वः आत्रेयः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में प्रेरक परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : अद्य । अ। द्य। नः। देव। सवितरिति। प्रजावत् ।प्र।जावत्। सावीः। सौभगम् ।सौ।भगम्। परा । दुष्वप्न्यम्।दुः। स्वप्न्यम्। सुव ।७।

पदार्थ : मन्त्र का देवता इन्द्र होने से मन्त्रोक्त ‘देव’ और ‘सवितः’ उसी के विशेषण हैं। हे (देव) ऐश्वर्यप्रदायक, प्रकाशमय, प्रकाशक, सर्वोपरि विराजमान, (सवितः) उत्तम बुद्धि आदि के प्रेरक इन्द्र परमात्मन् ! (अद्य) आज, आप (नः) हमारे लिए (प्रजावत्) सन्ततियुक्त अर्थात् उत्तरोत्तर बढ़नेवाले (सौभगम्) धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य आदि का धन (सावीः) प्रेरित कीजिए, (दुःष्वप्न्यम्) दिन का दुःस्वप्न, रात्रि का दुःस्वप्न और उनसे होनेवाले कुपरिणामों को (परासुव) दूर कर दीजिए ॥७॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना से मनुष्य निरन्तर बढ़नेवाले सद्गुणरूप बहुमूल्य धन को और दोषों से मुक्ति को पा लेता है ॥७॥