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Samveda/149

गौर्धयति मरुता श्रवस्युर्माता मघोनाम्।। युक्ता वह्नी रथानाम्॥१४९

Veda : Samveda | Mantra No : 149

In Hindi:

ऋषि : बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः | देवता : मरुतः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में ‘गौः’ शब्द द्वारा भूमि, गाय, वाणी, विद्युत् आदि के गुण-कर्म वर्णित हैं। इन्द्र से रचे गये भूमि आदि के वर्णन से रचयिता इन्द्र की ही स्तुति होती है, इस दृष्टि से मन्त्र का देवता इन्द्र है।

पदपाठ : गौः। धयति ।मरुताम्। श्रवस्युः। माता। मघोनाम्। युक्ता। वह्निः। रथानाम् ।५।

पदार्थ : प्रथमः—भूमि के पक्ष में। (मघोनाम्) ऐश्वर्यवान् (मरुताम्) मनुष्यों को (श्रवस्युः) मानो अन्न प्रदान करना चाहती हुई (माता) माता (गौः) भूमि (धयति) वर्षाजल को पीती है। (युक्ता) सूर्य से सम्बद्ध वह (रथानाम्) गतिमान् अग्नि, वायु, जल, पशु, पक्षी, मनुष्य आदिकों को (वह्निः) एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जानेवाली होती है ॥द्वितीय—गाय के पक्ष में। (मघोनाम्) यज्ञ रूप ऐश्वर्य से युक्त (मरुताम्) यजमान मनुष्यों को (श्रवस्युः) दूध-घी प्रदान करना चाहती हुई (माता गौः) गौ माता के तुल्य गाय (धयति) स्वच्छ जल पीती है। (युक्ता) यज्ञ के लिए नियुक्त वह (रथानाम्) यज्ञ-रूप रथों की (वह्निः) चलानेवाली होती है  ॥तृतीय—विद्युत् के पक्ष में। (मघोनाम्) साधनवान् (मरुताम्) मनुष्यों को (श्रवस्युः) मानो धन प्रदान करना चाहती हुई (माता) निर्माण करनेवाली (गौः) अन्तरिक्ष में स्थित विद्युत् (धयति) मेघ के जलों को पीती है और (युक्ता) शिल्पकर्म में प्रयुक्त हुई वह (रथानाम्) कलायन्त्र, भूयान, जलयान, विमान आदिकों की (वह्निः) चलानेवाली होती है ॥चतुर्थ—वाणी के पक्ष में। (मघोनाम्) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि के ऐश्वर्य से युक्त (मरुताम्) मनुष्यो को (श्रवस्युः) मानो अन्न, धन, विद्या, कीर्ति, आदि प्रदान करने की इच्छुक (माता गौः) माता वेदवाणी (धयति) ज्ञानरस का पान कराती है। (युक्ता) अध्ययन-अध्यापन में उपयोग लायी हुई वह (रथानाम्) रमणीय आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवर्चस आदि की (वह्निः) प्राप्त करानेवाली होती है ॥५॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘श्रवस्यु—मानो अन्न, धन, कीर्ति आदि प्राप्त कराना चाहती हुई’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥५॥

भावार्थ : इन्द्र परमात्मा से रची हुई भूमि, गाय, विद्युत्, वेदवाणी रूप गौओं का उपयोग लेकर सबको आध्यात्मिक, शारीरिक, भौतिक, वैज्ञानिक, याज्ञिक, सामाजिक और राष्ट्रिय उन्नति करनी चाहिए ॥५॥