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Samveda/200

इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत्। स हि स्थिरो विचर्षणिः॥२००

Veda : Samveda | Mantra No : 200

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में इन्द्र से भय-मुक्त करने की प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : इन्द्रः। अङ्ग। महत्। भयम्। अभि। सत्। अप । चुच्यवत्। सः। हि। स्थिरः। विचर्षणिः।वि।चर्षणिः।७।

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (अङ्ग) हे भाई, (इन्द्रः) विघ्नविदारक, सिद्धिप्रदाता परमेश्वर (अभि सत्) अभिभूत करनेवाले (महत्) बड़े भारी (भयम्) विपत्तियों से उत्पन्न, काम-क्रोध आदि शत्रुओं के उत्पीड़न से उत्पन्न अथवा जन्म-मरण से उत्पन्न भय को (अप चुच्यवत्) पूर्णतः दूर कर दे, (हि) क्योंकि (सः) वह परमेश्वर (स्थिरः) भयों से उद्विग्न न होनेवाला, स्थिरमति, और (विचर्षणिः) भय-निवारण के उपायों का द्रष्टा और दर्शानेवाला है  ॥द्वितीय—सूर्य के पक्ष में। (अङ्ग) हे भाई, (इन्द्रः) अन्धकार का विदारक, प्रकाशप्रदाता सूर्य (अभि सत्) अभिभूत या उद्विग्न करनेवाले (महत्) बड़े (भयम्) रोगों से उत्पन्न, बाघ आदि हिंसक जन्तुओं से उत्पन्न, पृथिवी आदि ग्रह-उपग्रहों की टक्कर की आशंका से उत्पन्न इत्यादि प्रकार के भयों को (अपचुच्यवत्) दूर करता है, (हि) क्योंकि (सः) वह सूर्य (स्थिरः) आकर्षणशक्ति के द्वारा आकाश में स्थिर अर्थात् केवल अपनी धुरी पर ही घूमने के कारण स्थानान्तर गति से रहित, और (विचर्षणिः) प्रकाश के दान द्वारा सबको पदार्थों का दर्शन करानेवाला है  ॥तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। (अङ्ग) हे भाई, (इन्द्रः) परम धनी, शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाला, प्रजाओं को सुख-सम्पदा देनेवाला राजा अथवा सेनापति (अभि सत्) राष्ट्र में व्याप्त होनेवाले (महत्) बड़े (भयम्) राष्ट्र के अन्दर के तथा बाहरी शत्रुओं से उत्पन्न किए गये भय को (अपचुच्यवत्) दूर कर दे, (हि) क्योंकि (सः) वह (स्थिरः) अपने पद पर अडिग, और (विचर्षणिः) गुप्तचर रूपी आँखों से अपने राष्ट्र में होनेवाले तथा शत्रु-राष्ट्र में होनेवाले सब घटनाचक्र का विशेष रूप से द्रष्टा है ॥७॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥

भावार्थ : कभी काम, क्रोध आदि रिपुओं से उत्पन्न होनेवाला भय, कभी दुर्भिक्ष, नदियों की बाढ़, संक्रामक रोग आदि का भय, कभी मानवीय विपत्तियों का भय, कभी बाघ आदि हिंसक जन्तुओं का भय, कभी पड़ोसी शत्रु राष्ट्रों का भय, कभी चोरों, लुटेरों, ठगों, हत्यारों आदि का भय, कभी जन्म-मृत्यु के चक्र का भय मनुष्यों को व्याकुल किए रखता है। स्थिर सर्वद्रष्टा परमात्मा, स्थिर प्रकाशक सूर्य और स्थिर गुप्तचर-रूप आँखोंवाला राजा उस सब प्रकार के भय से मुक्त कर दे, जिससे सब लोग सब ओर से निर्भय होते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त कर सकें ॥७॥