Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/318

इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत्पार्या युनजते धियस्ताः। शूरो नृषाता श्रवसश्च काम आ गोमति व्रजे भजा त्वं नः॥३१८

Veda : Samveda | Mantra No : 318

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : इन्द्रं। नरः। नेमधिता नेम।धिता।हवन्ते। यत्।पार्याः। युनजते। धियः।ताः।। शूरः। नृषाता।नृ।साता। श्रवसः । च। कामे। आ। गोमति। व्रजे। भज। त्वं। नः। ६।

पदार्थ : (इन्द्रम्) वीर परमात्मा वा राजा को (नरः) प्रजाजन (नेमधिता) आन्तरिक वा बाह्य संग्राम में और यज्ञ में (हवन्ते) सहायतार्थ पुकारते हैं। (पार्याः) पार होने योग्य वे, आन्तरिक और बाह्य विघ्नों को पार करने के लिए (यत्) जिस साधन का (युनजते) उपयोग करते हैं (ताः) वे (धियः) बुद्धियाँ और कर्म हैं, अर्थात् बुद्धि और कर्म का अवलम्बन करके वे सब शत्रुओं और विघ्नों को पार करते हैं। हे परमात्मन् वा राजन् ! (शूरः) शूरवीर (त्वम्) आप (नृषाता) संग्राम में (यशसः च) और यश की (कामे) अभिलाषा-पूर्ति में, और (गोमति व्रजे) प्रशस्त भूमि, वाणी, इन्द्रिय, दुधार गायों आदि के समूह में (नः) हमें (आ भज) भागी बनाइए, अर्थात् आप हमारी यशस्वी होने की कामना को पूर्ण कीजिए तथा हमें पृथिवी का राज्य, वाणी का बल, इन्द्रियों का बल और उत्तम जाति की गायें आदि प्राप्त कराइए ॥६॥इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥६॥

भावार्थ : परमात्मा की कृपा, राजा की सहायता एवं अपने बुद्धिकौशल तथा पुरुषार्थ से शत्रु-विजय, परम कीर्ति, भूमण्डल का साम्राज्य आदि सब अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं ॥६॥