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Samveda/321

ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः॥३२१

Veda : Samveda | Mantra No : 321

In Hindi:

ऋषि : बुहस्पतिर्नकुलो वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में सूर्य तथा परमेश्वर के महान् कार्य का वर्णन किया गया है।

पदपाठ : ब्रह्म। जज्ञानं। प्रथमं। पुरस्तात्। वि। सीमतः। सुरुचः।सु।रुचः। वेनः। अवरिति। सः। बुध्न्याः।उपमाः।उप।माः। अस्य ।विष्ठाः।वि।स्थाः सतः।च। योनिं। असतः।अ।सतः। ९।

पदार्थ : प्रथम—सूर्य के पक्ष में। (प्रथमम्) श्रेष्ठ (ब्रह्म) महान् आदित्यरूप ज्योति (पुरस्तात्) पूर्व दिशा में (जज्ञानम्) प्रकट हो रही है। (वेनः) कान्तिमान् सूर्य ने (सीमतः) चारों ओर अथवा मर्यादापूर्वक (सुरुचः) सम्यक् रोचमान किरणों को (वि आवः) रात्रि के अन्धकार के अन्दर से आविर्भूत कर दिया है। (सः) वह सूर्य (उपमाः) सबके समीप स्थित (अस्य) इस जगत् की (विष्ठाः) विशेष रूप से स्थितिसाधक (बुध्न्याः) अन्तरिक्षवर्ती दिशाओं को (विवः) अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है, और (सतः च) व्यक्त अर्थात् कार्यरूप में परिणत, (असतः च) और कारण के अन्दर अव्यक्तरुप से विद्यमान पदार्थ-समूह के (योनिम्) गृहरूप भूमण्डल को (विवः) प्रकाशित करता है ॥द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (प्रथमम्) श्रेष्ठ (ब्रह्म) जगत् का आदिकारण ब्रह्म (पुरस्तात्) पहले, सृष्टि के आदि में (जज्ञानम्) प्रकृति के गर्भ से महत् आदि जगत्प्रपञ्च का जनक हुआ। (वेनः) मेधावी उस परब्रह्म ने (सीमतः) मर्यादा से अर्थात् महदादि क्रम से व्यवस्थापूर्वक (सुरुचः) सुरोचमान पदार्थों को (वि आवः) उत्पन्न किया। (सः) उसी परब्रह्म ने (उपमाः) समीपता से धारण तथा आकर्षण की शक्तियों द्वारा एक-दूसरे को स्थिर रखनेवाले, और (अस्य) इस जगत् के (विष्ठाः) विशेष रूप से स्थिति के निमित्त (बुध्न्याः) आकाशस्थ सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, तारे आदि लोकों को (विवः) प्रकाशित किया। उसी ने (सतः च) व्यक्त भूमि, जल, अग्नि, पवन आदि (असतः च) और अव्यक्त महत्, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा आदि की (योनिम्) कारणभूत प्रकृति को (विवः) कार्य पदार्थों के रूप में प्रकट किया ॥९॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘सतश्च-सतश्च’ की एक बार आवृत्ति में यमक है ॥९॥

भावार्थ : कान्तिमान् सूर्य पूर्व दिशा में प्रकट होता हुआ अपनी सुप्रदीप्त किरणों को आकाश और भूमि पर प्रसारित करता हुआ सब दिशाओं को तथा सौर जगत् को प्रकाशित करता है। कान्तिमान् मेधावी परमेश्वर प्रकृति के मध्य से सुरोचमान पदार्थों को और सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, तारे आदि लोकों को प्रकट करता है। उस सूर्य का भली-भाँति उपयोग और उस परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना सबको करनी चाहिए ॥९॥