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Samveda/341

को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून्। आसन्नेषामप्सुवाहो मयोभून्य एषां भृत्यामृणधत्स जीवात्॥३४१

Veda : Samveda | Mantra No : 341

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : इन्द्र देवतावाले भी अगले मन्त्र में इन्द्र को क्योंकि सत्य प्रिय है, अतः सत्य का विषय वर्णित है।

पदपाठ : कः। अद्य।अ।द्य। युङ्क्ते । धुरि। गाः। ऋतस्य। शिमीवतः। भामिनः। दुर्हृणायून्।दुः।ह्रणायून्। आसन्।एषाम्। अप्सुवाहः।अप्सु।वाहः। मयोभून्।मयः।भून्। यः। एषाम् । भृत्याम्।ऋणधत्।सः। जीवात्।१०। आ.७०.अ.२९.पदं.२३५.भु.दशति.६.

पदार्थ : प्रथम—अध्यात्म पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज (शिमीवतः) कर्मवान्, आलस्यरहित, (भामिनः) तेजस्वी, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) नदी की धाराओं के सदृश बाधाओं के बीच से भी वहन कर ले जानेवाले, (मयोभून्) सुखप्रापक (गाः) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि रूप बैलों को (ऋतस्य) सत्यरूप रथ के (धुरि) धुरे में (युङ्क्ते) जोड़ेगा। (एषाम्) गतिशील (एषाम्) इन पूर्वोक्त इन्द्रियादिरूप बैलों के (आसन्) मुख में (यः) जो मनुष्य (भृत्याम्) उन-उनके उत्कृष्ट ग्राह्यविषयरूप जीविकाद्रव्य को (ऋणधत्) वृद्धि के साथ प्रदान करेगा, (सः) वह (जीवात्) प्रशस्त जीवन से युक्त होगा ॥यहाँ ‘सत्य के धुरे में’ इस कथन से सत्य में रथ का आरोप ध्वनित होता है। सत्य के धुरे में सामान्य बैल क्योंकि नहीं जोड़े जा सकते, अतः आरोप के विषय बैलों में आरोप्यमाण इन्द्रियादि गृहीत होते हैं। इन्द्रियादि में बैलों का आरोप होने से ही उनके मुख की भी कल्पना कर ली गयी है। अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज, संकट के समय (शिमीवतः) कर्मशूर, (भामिनः) क्षात्र तेज से युक्त, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) युद्धयात्रा में नदी, समुद्र आदि के जलों में युद्धपोत को खेकर ले जानेवाले, (मयोभून्) शत्रुओं को जीतकर राष्ट्रवासियों को सुख देनेवाले (गाः) गतिशील सैनिकों को (ऋतस्य) राष्ट्ररूप यज्ञ के (धुरि) रक्षा के धुरे में (युङ्क्ते) नियुक्त करेगा? राजा ही नियुक्त करेगा, यह अभिप्राय है। (आसन्नेषाम्) जिनके तरकस में बाण हैं अर्थात् जिन्होंने प्रचुर शस्त्रास्त्रों का संचय किया हुआ है, ऐसे (एषाम्) इन सैनिकों के (यः) जो राजा (भृत्याम्) वेतन को (ऋणधत्) समय-समय पर बढ़ायेगा (सः) वह राजा (जीवात्) शत्रु-विजय करके प्रजाओं के साथ चिरकाल तक जीवित रहेगा ॥१०॥इस मन्त्र में अध्यात्म और अधिराष्ट्र उभयविध अर्थ वाच्य होने से श्लेषालङ्कार है ॥१०॥

भावार्थ : सत्य के ज्ञानार्थ तथा प्रचारार्थ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का यथोचित उपयोग मनुष्यों को करना चाहिए, और राष्ट्र के शासक राजा को चाहिए कि राष्ट्र के रक्षक सैनिकों का भरपूर वेतन-प्रदान आदि से सत्कार करे ॥१०॥इस दशति में तार्क्ष्य नाम से परमेश्वर का स्मरण करने, इन्द्र-पर्वत के युगल की स्तुतिपूर्वक इन्द्र का स्तवन करने, उसके सख्य की याचना करने, इन्द्रिय-रूप गौओं का महत्त्व वर्णन करने तथा राजा, सैनिक आदि अर्थों के भी सूचित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥चतुर्थ प्रपाठक का प्रथम अर्ध समाप्त ॥तृतीय अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥