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Samveda/377

त्य सु मेषं महया स्वर्विदशतं यस्य सुभुवः साकमीरते। अत्यं न वाज हवनस्यद रथमि न्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः॥३७७

Veda : Samveda | Mantra No : 377

In Hindi:

ऋषि : सव्यः आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः जगदीश्वर वा राजा की अर्चना का विषय है।

पदपाठ : त्यम्। सु। मेषम्। महय। स्वर्विदम्।स्वः।विदम्। शतम्। यस्य। सुभुवः।सु।भुवः।साकम् ईरते। अत्यम् न। वाजम् हवनस्यद। वनम् । हवन । स्यदम्। रथम्। आ। इन्द्रम्। ववृत्याम्।अवसे। सुवृक्तिभिः।सु।वृक्तिभिः। ८।

पदार्थ : हे सखे ! तू (त्यम्) उस प्रसिद्ध, (मेषम्) सुखों से सींचनेवाले, (स्वर्विदम्) भूमि पर सूर्य के प्रकाश को अथवा राष्ट्र में बिजली के प्रकाश को प्राप्त करानेवाले जगदीश्वर वा राजा की (सु महय) भली-भाँति पूजा वा सत्कार कर, (यस्य) जिस जगदीश्वर वा राजा की (शतम्) सैंकड़ों जन (साकम्) साथ मिलकर (सुभुवः) उत्तम स्तुतियों को (ईरते) उच्चारण करते हैं। मैं भी (वाजम्) बलवान् (हवनस्यदम्) आह्वान के प्रति तुरन्त पहुँचनेवाले, (अत्यम्) निरन्तर कर्मशील (इन्द्रम्) जगदीश्वर वा राजा को (अवसे) रक्षा के लिए (सुवृक्तिभिः) शुभ स्तुतियों से (ववृत्याम्) अपनी ओर प्रवृत्त करूँ, (न) जैसे (वाजम्) वेगवान् (हवनस्यदम्) विजयस्पर्धा में ले जाये जानेवाले (अत्यम्) निरन्तर चलनेवाले (रथम्) विमानादि यान को (अवसे) देशान्तर में ले जाने के लिए (सृवृक्तिभिः) शोभन क्रियाओं अथवा यन्त्र-कलाओं से, चलने के लिए प्रवृत्त करते हैं ॥८॥इस मन्त्र में श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥८॥

भावार्थ : जैसे देशान्तर में जाने के लिए निरन्तर चल सकनेवाले रथ को प्रवृत्त करते हैं, वैसे ही रक्षा प्राप्त करने के लिए निरन्तर कर्मशील परमेश्वर वा राजा को अपनी ओर प्रवृत्त करना चाहिए ॥८॥