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Samveda/463

अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषासि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः। धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः। विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋ क्वभिः॥४६३

Veda : Samveda | Mantra No : 463

In Hindi:

ऋषि : अनानतः पारुच्छेपिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र का देवता पवमान सोम है। सूर्य के उपमान से आत्मा का वर्णन किया गया है।

पदपाठ : अया। रुचा । हरिण्या ।पुनानः। विश्वा। द्वेषाँसि । तरति ।सयुग्वभिः।स।युग्वाभिः। सूरः। न। सयुग्वभिः । स । युग्वाभिः। धारा। पृष्ठस्य। रोचते ।पुनानः। अरुषः। हरिः । विश्वा। यत्। रूपा। परियासि।परि।यासि। ऋक्वभिः। सप्तास्येभिः ।सप्त।आस्येभिः। ऋक्वभिः ।७।

पदार्थ : यह सोम अर्थात् इन्द्रियों को कर्मों में प्रेरित करनेवाला आत्मा (अया) इस (हरिण्या) हृदयहारिणी (रुचा) तेजस्विता से (पुनानः) पवित्रता देता हुआ (सयुग्वभिः) साथ नियुक्त होनेवाले प्राणों के साथ मिलकर (विश्वा द्वेषांसि) सब द्वेषी विघ्नों अथवा काम, क्रोध आदि छहों रिपुओं को (तरति) पार कर लेता है, (सूरः न) जैसे सूर्य(सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों से (विश्वा द्वेषांसि) सब शत्रुभूत अन्धकारों को (तरति) पार करता है। (पृष्ठस्य) प्रकाशसेचक आत्मारूप सोम की (धारा) प्रकाश-धारा (रोचते) भासित होती है। (अरुषः) तेज से आरोचमान (हरिः) पापहारी तू आत्मारूप सोम (पुनानः) मन, बुद्धि आदि को पवित्र करता है, (यत्) जबकि तू (ऋक्वभिः) प्रशस्तस्तुतियुक्त कर्मों के साथ, और (ऋक्वभिः) प्रशंसनीय (सप्तास्यैः) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन सप्तमुख प्राणों के साथ (विश्वा रूपा) सब रूपधारी मनुष्यों को (परियासि) प्राप्त होता है ॥यहाँ ‘सूरो न सयुग्वभिः’ द्वारा सूर्य को उपमान बनाने से शेष मन्त्र सूर्य के पक्ष में भी घटता है। कैसा सूर्य? जो (अया) इस (हरिण्या) तमोहारिणी (रुचा) दीप्ति से (पुनानः) भूमि को पवित्र करता हुआ (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों से (विश्वा द्वेषांसि) सब द्वेषकारी अन्धकार, रोग आदियों को (तरति) निवारण करता है, (पृष्ठस्य) वृष्टिकर्ता जिस सूर्य की (धारा) प्रकाशधारा या वृष्टिधारा (रोचते) चमकती है, जो (अरुषः) तेजस्वी रूपवाला (हरिः) आकर्षण-बल से पृथिवी आदि लोकों का धारणकर्ता सूर्य (पुनानः) पवित्रता देता है, (यत्) जबकि (सप्तास्येभिः) सात मुखों अर्थात् रंगोंवाली (ऋक्वभिः) प्रशंसनीय किरणों से (विश्वा रूपाणि) सब रूपवान् वस्तुओं को (परियासि) प्राप्त होता है ॥७॥इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। ‘सयुग्वभिः’ और ‘ऋक्वभिः’ की एक-एक बार आवृत्ति में यमक है ॥७॥

भावार्थ : जैसे सूर्य अपनी किरणों से रोग, मलिनता आदि को दूर कर समस्त भूमण्डल को पवित्र करता है, वैसे ही मनुष्यों का आत्मा सब पाप, द्वेष आदि कल्मषों को दूर कर जीवन को पवित्र करे ॥७॥