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Samveda/481

इन्दुः पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मतिः। सृजदश्व रथीरिव॥४८१

Veda : Samveda | Mantra No : 481

In Hindi:

ऋषि : कश्यपो मारीचः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में सोम परमात्मा के गुण-कर्मों का वर्णन है।

पदपाठ : इन्दुः। पविष्ट। चेतनः । प्रियः। कवीनाम्। मतिः। सृजत्।अश्वम्।रथीः। इव।५।

पदार्थ : (चेतनः) चेतना प्रदान करनेवाला, (कवीनां प्रियः) मेधावियों का प्रिय, (मतिः) ज्ञाता, (इन्दुः) चन्द्रमा के समान आह्लादक, सोमलता के समान रसागार परमेश्वर (पविष्ट) अन्तःकरण को पवित्र करता है और (अश्वम्) प्राण को (सृजत्) ऊर्ध्वारोहण के लिए प्रेरित कर देता है, (रथीः इव) जैसे सारथि (अश्वम्) रथ में नियुक्त घोड़े को (सृजत्) चलने के लिए प्रेरित करता है ॥५॥इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥५॥

भावार्थ : उपासना किया हुआ परमात्मा-रूप सोम योगी के चित्त को पवित्र करके उसके प्राणों को योगसिद्धियों के प्राप्त्यर्थ ऊर्ध्वारोहण के लिए प्रेरित कर देता है ॥५॥