Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/528

अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामाङ्गोषिणमवावशन्त वाणी। वना वसानो वरुणो नउ। सिन्धूर्वि रत्नधा दयते वार्याणि॥५२८

Veda : Samveda | Mantra No : 528

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : बृहती | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में कैसा परमात्मा क्या करता है, इसका वर्णन है।

पदपाठ : अभि। त्रिपृष्ठम्।त्रि।पृष्ठम्। वृषणम्। वयोधाम्।वयः।धाम् । अङ्गोषिणम्। अवावशन्त। वाणीः। वना। वसानः। वरुणः।न।सिन्धुः। वि। रत्नधाः।रत्न।धाः। दयते। वार्याणि ।६।

पदार्थ : (त्रिपृष्ठम्) ऋग्-यजुः-साम रूप, पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्यौ रूप, अग्नि-वायु-आदित्य रूप, सत्त्व-रजस्-तमस् रूप और मन-प्राण-आत्मा रूप तीन पृष्ठोंवाले, (वृषणम्) सुख आदि के वर्षक, (वयोधाम्) आयु प्रदान करनेवाले (अङ्गोषिणम्) अङ्ग-अङ्ग में निवास करनेवाले अथवा स्तुति-योग्य परमात्मा का (वाणीः) वेदवाणियाँ (अभि अवावशन्त) गान करती हैं। (वरुणः न) सूर्य के समान (वना) तेज की किरणों को (वसानः) धारण करता हुआ वह परमात्मा (रत्नधाः) रत्नप्रदाता (सिन्धुः) समुद्र के समान (वार्याणि) वरणीय भौतिक एवं आध्यात्मिक रत्नों को (वि दयते) विशेष रूप से प्रदान करता है ॥६॥इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥६॥

भावार्थ : सूर्य के समान तेजों का और समुद्र के समान रत्नों का भण्डार परमेश्वर तेजों तथा रत्नों को प्रदान कर सबको समृद्ध करता है ॥६॥