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Samveda/538

साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः। हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी॥५३८

Veda : Samveda | Mantra No : 538

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में यह वर्णित है कि कब जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करता है।

पदपाठ : साकमुक्षः।साकम्।उक्षः। मर्जयन्त। स्वसारः। दश। धीरस्य ।धीतयः । धनुत्रीः। हरिः । परि। अद्रवत्। जाः। सूर्यस्य।सु।ऊर्यस्य। द्रोणं। ननक्षे। अत्यः। न। वाजी।६।

पदार्थ : प्रथम—सोम ओषधि के पक्ष में। (धीरस्य) बुद्धिमान् यजमान के (साकमुक्षः) साथ मिलकर सोमरस को निचोड़नेवाली, (धनुत्रीः) प्रेरक, (दश) दस (धीतयः) अंगुलियाँ जब सोमरस को (मर्जयन्ति) शुद्ध करती हैं, तब (सूर्यस्य) सूर्य का (जाः) पुत्र (हरिः) हरे रंग का सोमरस (पर्यद्रवत्) चारों ओर फैल जाता है। (न) जैसे (वाजी) वेगवान् (अत्यः) घोड़ा (द्रोणम्) लकड़ी से बने रथ को (ननक्षे) व्याप्त करता है अर्थात् रथ में नियुक्त होता है, वैसे ही सोमरस (द्रोणम्) द्रोणकलश में (ननक्षे) व्याप्त होता है ॥द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (धीरस्य) ध्यान में स्थित योगी की (साकमुक्षः) साथ मिलकर ज्ञानों और कर्मों से सींचनेवाली, (स्वसारः) बहिनों के समान परस्पर सहायता करनेवाली, (धनुत्रीः) प्रेरक (दश) दस (धीतयः) यम-नियम-भावनाएँ, जब (मर्जयन्त) आत्मा को शुद्ध करती हैं, तब (सूर्यस्य) परमात्मा का (जाः) पुत्र (हरिः) उन्नति के मार्ग पर जानेवाला आत्मा (पर्यद्रवत्) क्रियाशील हो जाता है, और (न) जैसे (वाजी) वेगवान् (अत्यः) घोड़ा (द्रोणम्) लकड़ी से बने रथ को (ननक्षे) प्राप्त करता है, अर्थात् उसमें जुड़ता है, वैसे ही वह आत्मा (द्रोणम्) क्रियाशील परमात्मा-रूप द्रोणकलश को (ननक्षे) प्राप्त कर लेता है ॥६॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी’ में श्लिष्टोपमा है। सकार-धकार-नकार तथा रेफ की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥६॥

भावार्थ : अंगुलियों से परिशुद्ध सोमरस जैसे द्रोणकलश को प्राप्त करता है, वैसे ही यम-नियम की भावनाओं से परिशुद्ध हुआ जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करता है ॥६॥