Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/559

वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः। प्राणा सिन्धूना कलशा अचिक्रददिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः॥५५९

Veda : Samveda | Mantra No : 559

In Hindi:

ऋषि : सिकता निवावरी | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : वृषा। मतीनाम्। पवते। विचक्षणः। वि।चक्षणः। सोमः। अह्नाम्।अ।ह्नाम्। प्रतरीत।प्र।तरीता। उषसाम्। दिवः।प्राणा।प्र।आना। सिन्धूनाम्। कलशान्। अचिक्रदत्। इन्द्रस्य। हार्दि। आविशन्।आ।विशन्। मनीषिभिः।६।

पदार्थ : (विचक्षणः) विशेष द्रष्टा और दृष्टिप्रदाता (सोमः) परमात्मा (मतीनाम्) प्रज्ञाओं का (वृषा) वर्षक होता हुआ (पवते) उपासकों को प्राप्त होता है । वही (अह्नाम्) दिनों का, (उषसाम्) उषाओं का और (दिवः) सूर्य का (प्रतरीता) संतारक और सञ्चालक होता है। (प्राणा) सबका प्राणभूत वह (सिन्धूनाम्) नदियों के (कलशान्) कल-कल निनाद करनेवाले प्रवाहों को (अचिक्रदत्) शब्दयुक्त करता है। वही (मनीषिभिः) मन को सन्मार्ग में प्रेरित करनेवाले स्तोत्रों से (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (हार्दि) हृत्प्रदेश में (आ विशन्) प्रविष्ट होता है ॥६॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को चाहिए कि सर्वद्रष्टा, सबको विवेक प्रदान करनेवाले, उषा-सूर्य-दिन आदि के व्यवस्थापक, नदियों को कल-कल निनाद करानेवाले परमात्मा को हृदय में धारण करें ॥६॥