Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/563

प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवोऽसिष्यदन्त गाव आ न धेनवः। बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुस्रिया निर्णिजं धिरे॥५६३

Veda : Samveda | Mantra No : 563

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिर्भालन्दः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में विद्वानों का विषय है।

पदपाठ : प्र। देवम्। अच्छा। मधुमन्तः। इन्दवः। असिष्यदन्त। गावः। आ। न। धेनवः। बर्हिषदः।बर्हि।सदः। वचनावन्तः। ऊधभिः। परिस्रुतम्।परि।स्रुतम्। उस्रियाः ।उ।स्रियाः। निर्णिजम्।निः।निजम्। धिरे १०।

पदार्थ : (मधुमन्तः) मधुर व्यवहारवाले (इन्दवः) श्रद्धा-रस से भरपूर विद्वान् जन (देवम् अच्छ) दिव्यगुणों से युक्त परमात्मा को लक्ष्य करके (प्र असिष्यदन्त) श्रद्धारस को प्रवाहित करते हैं, (न) जैसे (धेनवः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (गावः) गौएँ (असिष्यदन्त) बछड़ों के प्रति अपने दूध को प्रवाहित करती हैं। (बर्हिषदः) यज्ञिय कुशासन पर स्थित, (वचनावन्तः) स्तुति के उद्गार प्रकट करनेवाले वे विद्वान् लोग (निर्णिजम्) शुद्ध (परिस्रुतम्) उत्पन्न श्रद्धारस को (ऊधभिः) हृदयरूप ऊधसों में (धिरे) धारण करते हैं, जैसे (बर्हिषदः) यज्ञ में स्थित (वचनावत्यः) हम्भा शब्द करनेवाली (उस्रियाः) गौएँ (निर्णिजम्) शुद्ध दूध को (ऊधभिः) ऊधसों में (धिरे) धारण करती हैं ॥१०॥इस मन्त्र में ‘गाव आ न धेनवः’ में उपमा और पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है । उत्तरार्द्ध में ‘उस्रियाः’ में लुप्तोपमा है ॥१०॥

भावार्थ : परमात्मा के प्रति सब मनुष्यों को उसी प्रकार भक्तिरस क्षरित करना चाहिए, जैसे गौएँ बछड़ों के प्रति दूध क्षरित करती हैं ॥१०॥