Samveda/594
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम। यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि॥५९४
Veda : Samveda | Mantra No : 594
In English:
Seer : aatmaa | Devta : annam | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ahamasmi prathamajaa RRitasya puurva.m devebhyo amRRitasya naama . yo maa dadaati sa idevamaavadahamannamannamadantamadmi.594
Component Words : aham. asmi. prathamajaaH . prathama. jaaH. RRitasya. puurvam. devebhyaH. amRRitasya.aa.mRRitasya. naama. yaH. maa. dadaati. saH. it. eva.maa avat. aham. annam. annam. adantam.admi. . aaapabaadashati..
In Hindi:
ऋषि : आत्मा | देवता : अन्नम् | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अगले मन्त्र का अन्न देवता है। परमेश्वर अपना परिचय दे रहा है।
पदपाठ : अहम्। अस्मि। प्रथमजाः । प्रथम। जाः। ऋतस्य। पूर्वम्। देवेभ्यः। अमृतस्य।आ।मृतस्य। नाम। यः। मा। ददाति। सः। इत्। एव।मा अवत्। अहम्। अन्नम्। अन्नम्। अदन्तम्।अद्मि। ९। आ.५०.अ.१३.प.१५२.बा.दशति।१।
पदार्थ : (अहम्) मैं परमेश्वर (ऋतस्य) जगत् में सर्वत्र दिखायी देनेवाले सत्य नियम का (प्रथमजाः) प्रथम उत्पादक (अस्मि) हूँ। मैं (देवेभ्यः) सब चमकनेवाले सूर्य, बिजली, अग्नि, तारामण्डल आदियों की उत्पत्ति से (पूर्वम्) पहले विद्यमान था। मैं (अमृतस्य) मोक्षावस्था में प्राप्त होनेवाले आनन्दामृत का (नाम) केन्द्र या स्रोत हूँ। (यः) जो मनुष्य (मा) मुझे (ददाति) अपने आत्मा में समर्पित करता है (सः इत् एव) निश्चय से वही (मा) मुझे (अवत्) प्राप्त होता है। (अहम्) मैं (अन्नम्) अन्न हूँ, भक्तों का भोजन हूँ और मैं (अन्नम् अदन्तम्) भोग भोगनेवाले प्रत्येक प्राणी को (अद्मि) खाता भी हूँ, अर्थात् प्रलयकाल में ग्रस भी लेता हूँ, इस कारण मैं अत्ता भी हूँ ॥परमेश्वर के अन्न और अत्ता रूप को उपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र में इस प्रकार कहा है—मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ (तै० उप ०३।१०।६)। ‘परमेश्वर अत्ता इस कारण है, क्योंकि चर-अचर को ग्रसता है’ (ब्र० सू० १।२।९) ॥निरुक्त में जो परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत तथा आध्यात्मिक तीन प्रकार की ऋचाएँ कही गयी हैं, उनमें यह ऋचा आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक ऋचाएँ वे होती हैं, जिनमें उत्तम पुरुष की क्रिया तथा ‘अहम्’ सर्वनाम का प्रयोग हो अर्थात् जिसमें देवता अपना परिचय स्वयं दे रहा हो ॥९॥इस मन्त्र में ‘मैं अन्न हूँ, मैं अन्न खानेवाले को खाता हूँ’ में विरोध प्रतीत होने से विरोधालङ्कार व्यङ्ग्यहै ॥९॥
भावार्थ : जैसे प्राणी भोजन के बिना, वैसे ही भक्तजन परमेश्वर के बिना नहीं जी सकते। जैसे प्राणी अन्न का ग्रास लेते हैं, वैसे ही परमेश्वर चराचर जगत् को ग्रसता है ॥९॥पूर्व दशति में सोम नाम से परमात्मा का वर्णन होने से तथा इस दशति में भी इन्द्र, वरुण, सोम आदि नामों से परमात्मा का ही वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥षष्ठ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
टिप्पणी :प्रथम मन्त्र का इन्द्र देवता है। इसमें इन्द्र परमात्मा के कौशल का वर्णन है।
In Sanskrit:
ऋषि : आत्मा | देवता : अन्नम् | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अन्नम् देवता। परमेश्वरः स्वपरिचयं ददाति।
पदपाठ : अहम्। अस्मि। प्रथमजाः । प्रथम। जाः। ऋतस्य। पूर्वम्। देवेभ्यः। अमृतस्य।आ।मृतस्य। नाम। यः। मा। ददाति। सः। इत्। एव।मा अवत्। अहम्। अन्नम्। अन्नम्। अदन्तम्।अद्मि। ९। आ.५०.अ.१३.प.१५२.बा.दशति।१।
पदार्थ : (अहम्) परमेश्वरः (ऋतस्य) जगति सर्वत्र दृश्यमानस्य सत्यनियमस्य (प्रथमजाः) प्रथमो जनयिता। प्रथमोपपदात् जनी प्रादुर्भावे धातोर्ण्यन्तात् ‘जनसनखनक्रमगमो विट्। अ० ३।२।६७’ इति विट् प्रत्ययः। ‘विड्वनोरनुनासिकस्यात्। अ० ६।४।४१’ इत्यात्वम्। (अस्मि) वर्ते। अहम् (देवेभ्यः) सर्वेभ्यः दीप्यमानेभ्यः विद्युदग्नितारामण्डलादिभ्यः, तदुत्पत्तेः इत्यर्थः (पूर्वम्) प्रागपि आसम्। अहम् (अमृतस्य) मोक्षावस्थाजन्यस्य आनन्दामृतस्य (नाम) नाभिः केन्द्रम् स्रोतःस्थानं वा अस्मि। नमन्ति नता भवन्ति एकत्र तिष्ठन्ति अत्र इति नाम नाभिः केन्द्रं स्रोतःस्थलं वा। तथा च ‘अमृतस्य नाभिः’ इति तैत्तिरीयोपनिषदि पाठः। तै० उ० भृगुवल्ली १०।७। (यः) जनः (मा) माम् (ददाति) स्वात्मनि समर्पयति (सः इद् एव) निश्चयेन स एव (मा) माम् (अवत्) प्राप्नोति। अवतिः गतिकर्मा। निघं० २।१४, लेटि रूपम्। (अहम्) परमेश्वरः (अन्नम्) अन्ननामा अस्मि। अद्यते भक्तैर्भुज्यते इत्यन्नम् इति व्युत्पत्तेः। किञ्च, अहम् (अन्नम् अदन्तम्) भोगं भुञ्जानम् प्रत्येकं जनम् (अद्मि) भक्षयामि, तस्माद् ‘अत्ता’ अप्यस्मि। उक्तं चान्यत्र ‘अहमन्नम्, अहमन्नम्, अहमन्नम्, अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः। तै० उ० ३।१०।६’, ‘अत्ता चराचरग्रहणात्। ब्र० सू० १।२।९’ इति ॥ निरुक्ते याः परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्चेतित्रिविधा ऋचः प्रोक्तास्तासु आध्यात्मिकीयम् ऋक्। ‘आध्यात्मिक्य उत्तमपुरुषयोगा अहमिति चैतेन सर्वनाम्ना’ निरु० ७।२ इति तल्लक्षणात् ॥९॥अत्र ‘अहमन्नम्’ ‘अन्नमदन्तमद्मि’ इति विरोधप्रतीतेर्विरोधालङ्कारो व्यङ्ग्यः ॥९॥
भावार्थ : यथा प्राणिनो भोजनं विना न जीवन्ति, तथा भक्ताः परमेश्वरं विना। यथा प्राणिनोऽन्नं ग्रसन्ते, तथा परमेश्वरश्चराचरं जगत् ॥९॥पूर्वदशत्यां सोमनाम्ना परमात्मनो वर्णनादत्र चेन्द्रवरुणसोमादिनामभिस्तस्यैव वर्णनादेतद्दशत्यर्थस्य पूर्वदशत्यर्थेन सह संगतिरस्तीति बोध्यम् ॥इति षष्ठे प्रपाठके तृतीयार्द्धे प्रथमा दशतिः ॥इति षष्ठेऽध्याये प्रथमः खण्डः ॥
टिप्पणी:तत्र प्रथमाया इन्द्रो देवता। इन्द्रस्य परमात्मनः कौशलं वर्णयति।