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Samveda/603

सं ते पयासि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः। स्युत्तमानि धिष्व॥६०३

Veda : Samveda | Mantra No : 603

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले दो मन्त्रों का पवमान सोम देवता है। इस मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : सम्। ते। पयाँसि। सम्।उ। यन्तु। वाजाः।सम्। वृष्ण्यानि। अभिमातिषाहः।अभिमाति।साहः। आप्यायमानः।आ।प्यायमानः।अमृताय।अ।मृताय। सोम।दिवि।श्रवाँसि। उत्तमानि। धिष्व।२।

पदार्थ : हे (सोम) पवित्रतादायक, करुणारसागार परमात्मन् ! (अभिमातिषाहः) कामादि शत्रुओं का पराजय करनेवाले (ते) आपके (पयांसि) प्रेमरस और आनन्दरस (संयन्तु) हमें प्राप्त हों, (उ) और (वाजाः) बल (सम्) हमें प्राप्त हों, (वृष्ण्यानि) पुरुषार्थयुक्त कर्म (सम्) हमें प्राप्त हों। (आप्यायमानः) हृदय में बढ़ते हुए आप (अमृताय) अमरत्व-प्रदान के लिए (दिवि) हमारे आत्मा में (उत्तमानि) उत्कृष्टतम (श्रवांसि) यशों को (धिष्व) निहित कीजिए ॥२॥

भावार्थ : यहाँ बढ़ते हुए चन्द्रमा का आकाश में उत्तम चाँदनी को फैलाने का अर्थ ध्वनित हो रहा है, उससे परमात्मा चन्द्रमा के समान है, यह उपमाध्वनि निकलती है ॥२॥जैसे-जैसे परमात्मा में हमारा ध्यान बढ़ता है, वैसे-वैसे हमारे अन्तः- करण में परमात्मा मानो बढ़ता हुआ हमें आत्मबल, कर्मनिष्ठता और उत्तम यश प्रदान करता है ॥२॥