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Samveda/607

समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति। शुचयो दीदिवासमपान्नपातमुप यन्त्यापः॥६०७

Veda : Samveda | Mantra No : 607

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अपानपात् | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में नदियों के दृष्टान्त से परमात्मा की महिमा वर्णित है।

पदपाठ : सम्। अन्याः।अन्।याः।यन्ति। उप। यन्ति।अन्याः।अन्।याः। समानम्।सम्।आनम्। ऊर्वम्। नद्यः। पृणन्ति। तम् । उ। शुचिम्। शुचयः। दीदिवाँसम्। अपाम्। नपातम्। उप। यन्ति।आपः।६।

पदार्थ : (अन्याः) कुछ नदियाँ (सं यन्ति) एक-दूसरी से मिलकर समुद्र को प्राप्त होती हैं, (अन्याः) और दूसरी कुछ नदियाँ (उपयन्ति) स्वतन्त्र रूप से पृथक्-पृथक् समुद्र में पहुँचती हैं। (नद्यः) वे सभी नदियाँ (समानम्) एक ही (ऊर्वम्) समुद्र की अग्नि को (पृणन्ति) तृप्त करती हैं। इसी प्रकार (तम् उ) उसी (शुचिम्) पवित्र (दीदिवांसम्) देदीप्यमान, (अपाम्) आप्त प्रजाओं को (नपातम्) पतित न करनेवाले, प्रत्युत उन्नत करनेवाले परमात्मारूप अग्नि को (आपः) आप्त प्रजाएँ (उपयन्ति) प्राप्त होती हैं ॥६॥इस मन्त्र में व्यङ्ग्य-साम्यवाले दो वाक्यों में एक ही सामान्य धर्म ‘पृणन्ति’ और ‘उपयन्ति’ इन पृथक्-पृथक् शब्दों से वर्णित होने के कारण प्रतिवस्तूपमा अलङ्कार है। ‘सम, समा,’ ‘न्या, न्या,’ ‘यन्त्यु, यन्त्य,’ ‘पयन्त्य, पयन्त्या’ में छेकानुप्रास है ॥६॥

भावार्थ : जैसे व्याप्त नदियाँ एक ही समुद्र को भरती हैं, वैसे ही आप्त प्रजाएँ एक ही परमात्मा को प्राप्त होती हैं ॥६॥