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Samveda/668

ब्रह्माणस्त्वा युजा वय सोमपामिन्द्र सोमिनः। सुतावन्तो हवामहे(फौ)।।॥६६८

Veda : Samveda | Mantra No : 668

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का उपदेश किया गया है।

पदपाठ : ब्रह्माणः । त्वा । युजा । वयम् । सोमपाम् । सोम । पाम् । इन्द्र । सोमिनः । सुतावन्त । हवामहे॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) आत्मन् ! हे शिष्य ! (सोमपाम्) ज्ञान का पान करनेवाले (त्वा) तुझे (सोमिनः) ज्ञानवान्, (सुतावन्तः) शिष्यरूप पुत्रोंवाले, (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानी (वयम्) हम गुरुजन (युजा) पारस्परिक सहयोग के साथ अथवा तेरे साथ घनिष्ठ सम्बन्धपूर्वक (हवामहे) विद्या पढ़ाने और सदाचार सिखाने के लिए बुलाते हैं ॥३॥

भावार्थ : जो स्वयं विद्यावान्, सदाचारी और ब्रह्म का अनुभव प्राप्त किये हुए गुरु होते हैं, वे ही शिष्यों को विद्वान् सदाचारी और ब्रह्मज्ञानी बना सकते हैं ॥३॥