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Samveda/696

अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णाति सानसिम्। वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित्(कि)।।॥६९६

Veda : Samveda | Mantra No : 696

In Hindi:

ऋषि : अग्निश्चाक्षुषः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : अस्य । इत् । इन्द्रः । मदेषु । आ । ग्राभम् । गृभ्णाति । सानसिम् । वज्रम् । च । वृषणम् । भरत् । सम् । अप्सुजित् । अप्सु । जित् ॥

पदार्थ : (अस्य इत्) इस ज्ञान-कर्म-उपासना रूप सोमरस के ही (मदेषु) उत्साहों में (इन्द्रः) वीर मनुष्य (सानसिम्) ग्रहण करने योग्य (ग्राभम्) धनुष् को (आ गृभ्णाति) थामता है, (च) और (अप्सुजित्) समुद्र के जल में तथा अन्तरिक्ष में भी शत्रु को जीतनेवाला वह वीर (वृषणम्) गोली या गोले बरसानेवाले (वज्रम्) बन्दूक, तोप आदि सुदृढ़ हथियार का (संभरत्) संधान कर लेता है ॥३॥

भावार्थ : ज्ञान-कर्म-उपासना रूप दिव्य सोमरस के पान से अपूर्व उत्साहवान् होकर मनुष्य भूमि, जल, आकाश कहीं भी विद्यमान दुर्दान्त शत्रुओं को भी जीतने में समर्थ हो जाता है ॥३॥