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Samveda/709

उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्। त्वामिध्यवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्(च)।।॥७०९

Veda : Samveda | Mantra No : 709

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : इन्द्रः | छन्द : काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा का वरण करते हैं।

पदपाठ : उप । त्वा । कर्मन् । ऊतये । सः । नः । युवा । उप्रः । चक्राम । यः । घृषत् । स्वाम् । इत् । हि । अवितारम् । ववृमहे । सखायः । स । खायः । इन्द्र । सानसिम् ॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमसहायक परमात्मन् ! (कर्मन्) कर्मों में (ऊतये) रक्षा के लिये हम (त्वा) आपको (उप) प्राप्त होते हैं। भाइयो ! देखो (सः) वह (नः) हमारा (युवा) सदा युवा रहनेवाला (उग्रः)वीर प्रभु, उस पर (चक्राम) आक्रमण कर देता है, (यः) जो आन्तरिक या बाह्य शत्रु (धृषत्) हमें दबाता है। हे परमेश ! (सखायः) आपके सखा हम (अवितारम्) रक्षक, (सानसिम्) संभजनीय (त्वाम् इत् हि) आपको ही (ववृमहे) वरण करते हैं ॥२॥

भावार्थ : महाशक्तिशाली जीव को भी संसार-समराङ्गण में विजय पाने के लिये परमात्मा की सहायता अपेक्षित होती है ॥२॥