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Samveda/727

यस्ते शृङ्गवृषो णपात्प्रणपात्कुण्डपाय्यः। न्यस्मिं दध्र आ मनः(दि)।।॥७२७

Veda : Samveda | Mantra No : 727

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : यः । ते । शृङ्गवृषः । शृङ्ग । वृषः । नपात् । प्रणपात् । प्र । नपात । कुण्डपाय्यः । कुण्ड । पाय्य । नि । अस्मिन् । दध्रे । आ । मनः ॥

पदार्थ : हे (शृङ्गवृषः नपात्) रश्मियों से वर्षा करनेवाले सूर्य को बिना ही आधार के आकाश में स्थिर करनेवाले जगदीश्वर ! (यः ते) जो आपका (प्र नपात्) प्रकृष्ट रूप से रक्षक (कुण्डपाय्यः) समुद्ररूप कुण्ड जिसमें सूर्य द्वारा पिये जाते हैं, ऐसा वृष्टिरूप यज्ञ है, (अस्मिन्) इसमें, उपासक लोग (मनः) अपने मन को (आ निदध्रे) निहित करते हैं ॥३॥

भावार्थ : जैसे सूर्य समुद्ररूप कुण्डों को पीकर बादल बना कर वर्षा करता है, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि धन कमाकर और योगसिद्धियाँ प्राप्त करके सत्पात्रों में उनकी वर्षा करें ॥३॥