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Samveda/742

स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या। गमद्वाजेभिरा स नः(टी)।।॥७४२

Veda : Samveda | Mantra No : 742

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : सः । घ । नः । योगे ।आ ।भुवत् ।सः ।राये ।सः ।पुरन्ध्या ।पुरम् ।ध्या ।गमत् ।वाजेभिः ।आ ।सः ।नः ॥

पदार्थ : (सः) वह प्रसिद्ध (इन्द्र) परमात्मा (नः) हमारे (योगे) अष्टाङ्गयोग की सिद्धि में (आ भुवत्) सहायक होवे। (सः) वह (राये) अणिमा, लघिमा, महिमा आदि ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिए, हमारा सहायक होवे। (सः) वह (पुरन्ध्या) पालन करनेवाली बुद्धि से हमें संयुक्त करे। (सः) वह (वाजेभिः) अध्यात्म-बलों के साथ (नः) हमारे पास (आगमत्) आये ॥३॥

भावार्थ : योगसिद्धि के मार्ग में जो विघ्न उपस्थित होते हैं, वे परमात्मा की सहायता से दूर किये जा सकते हैं ॥३॥