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Samveda/747

स प्रथमे व्योमनि देवाना सदने वृधः। सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्॥७४७

Veda : Samveda | Mantra No : 747

In Hindi:

ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : सः ।प्रथमे ।व्योमनि ।वि ।ओगनि ।देवानाम् ।सदने ।वृधः ।सुपारः ।सु ।पारः ।सुश्रवस्तमः ।सु ।श्रवस्तमः ।सम् ।अप्सुजित् ।अप्सु ।जित् ॥

पदार्थ : (सः) वह विद्याप्रदाता आचार्य (प्रथमे) श्रेष्ठ (व्योमनि) आकाश के समान व्यापक ओंकारपदवाच्य ब्रह्म में स्थित हुआ (देवानां सदने) विद्वानों के सदन गुरुकुल में रहता हुआ (वृधः) छात्रों की उन्नति करानेवाला, (सुपारः) विद्या के समुद्र से पार करनेवाला, (सुश्रवस्तमः) अत्यन्त यशस्वी, (अप्सुजित्) व्याप्त विद्याओं में तथा शुभकर्मों में अन्यों को जीत लेनेवाला अर्थात् अन्यों की अपेक्षा अधिक पारंगत है। मैं (सम्) उसकी भली-भाँति स्तुति करता हूँ ॥२॥

भावार्थ : सुयोग्य, विद्या के सागर, कर्मयोगी आचार्य को पाकर विद्यार्थी भी वैसे ही बनते हैं ॥२॥