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Samveda/750

स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः । सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देवराधो जनानाम्(तु)।।॥७५०

Veda : Samveda | Mantra No : 750

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में अग्निहोत्र के लाभों का वर्णन है।

पदपाठ : अ ।मृतम् ।सः ।योजते ।अरुषा ।विश्वभोजसा ।विश्व ।भोजसा ।सः ।दुद्रवत् ।स्वाहुतः ।सु ।आहुतः ।सुब्रह्मा ।सु ।ब्रह्मा ।यज्ञः ।सुशनी ।सु ।शमी ।वसूनाम देवम् ।राधः ।जनानाम् ॥

पदार्थ : (सः) वह यज्ञाग्नि (विश्वभोजसा) सबका पालन करनेवाले (अरुषा) चमकते तेज से (योजते) संयुक्त होता है तथा यजमानों को संयुक्त करता है। (सः) वह यज्ञाग्नि (स्वाहुतः) भले प्रकार आहुति दिये जाने पर (दुद्रवत्) अत्यधिक गतिमय हो जाता है, ज्वालाओं को लपलपाने लगता है। (सुब्रह्मा) श्रेष्ठ ब्रह्मा जिसमें बना है, ऐसा (यज्ञः) यज्ञ (वसूनाम्) आहिताग्नि यजमानों को (सुशमी) उत्तम शान्ति देनेवाला होता है। वह यज्ञ (जनानाम्) अग्निहोत्री जनों को (देवम्) प्रकाशक (राधः) ज्योतिरूप धन देता है ॥२॥

भावार्थ : सुयोग्य ब्रह्मा को अध्यक्ष पद पर नियुक्त करके किया हुआ यज्ञ, सुख, शान्ति और स्वास्थ्य देनेवाला, लोगों को ज्योति प्रदान करनेवाला तथा अध्यात्ममार्ग में प्रेरित करनेवाला होता है ॥२॥