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Samveda/752

उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचा उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्। तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि(वा)।।॥७५२

Veda : Samveda | Mantra No : 752

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : उषाः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में सूर्य और उषा का वर्णन है।

पदपाठ : उत् ।उस्रियाः ।उ ।स्रियाः ।सृजते ।सूर्यः ।सचा ।उद्यत् ।उत् ।यत् ।नक्षत्रम् ।अचिंवत् ।तव ।इत् ।उपः ।व्युषि ।वि ।उषि ।सूर्यस्य ।च ।सम् ।भक्तेन ।गमेमहि॥

पदार्थ : प्रथम—प्राकृतिक सूर्य और उषा के पक्ष में। (सूर्यः) सूर्य (सचा) एक साथ (उस्रियाः) किरणों को (उत्सृजते) छोड़ता है, जिससे (उद्यत्) उदित होते हुए (नक्षत्रम्) गतिमय ग्रह-उपग्रह आदि (अर्चिवत्) दीप्तिमान् हो जाते हैं। (उषः) हे उषा ! (तव इत्) तेरे (सूर्य्यस्य च) और सूर्य के (व्युषि) प्रकाशित होने पर, हम (भक्तेन) एश्वर्य से (सं गमेमहि) संयुक्त होवें ॥द्वितीय—अध्यात्म पक्ष में। (सूर्यः) सूर्य के समान प्रकाशमय और प्रकाशक परमात्मा (सचा) एक साथ (उस्रियाः) दिव्य प्रकाश की रश्मियों को (उत्सृजते) छोड़ता है, जिससे (उद्यत्) उन्नत होते हुए (नक्षत्रम्) प्रगतिशील मन, बुद्धि आदि (अर्चिवत्) प्रकाशमान हो जाते हैं। (उषः) हे अध्यात्मप्रभा ! (तव इत्) तेरे (सूर्यस्य च) और परमात्मा रूप सूर्य के (व्युषि) प्रकाशित होने पर, हम (भक्तेन) दिव्य ऐश्वर्य से (सं गमेमहि) संयुक्त होवें ॥२॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। उपमानोपमेयभाव व्यङ्ग्य है ॥२॥

भावार्थ : जैसे उषा और सूर्य के उदय होने पर सब कुछ प्रकाशित हो उठता है, वैसे ही आध्यात्मिक प्रभा और परमात्मा के उदय होने पर उपासकों का हृदय प्रकाशित हो जाता है ॥२॥