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Samveda/798

इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च। उग्र उग्राभिरूतिभिः॥७९८

Veda : Samveda | Mantra No : 798

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : तृतीय ऋचा की पूर्वार्चिक में ५९८ क्रमाङ्क पर परमेश्वर और राजा के पक्ष में व्याख्या की गयी थी। यहाँ जीवात्मा का विषय कहते हैं।

पदपाठ : इन्द्र ।वाजेषु ।नः ।अव ।सहस्रप्रधनेषु ।सहस्र ।प्रधनेषु ।च ।उग्रः ।उग्राभिः ।ऊतिभिः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) शरीर के अधिष्ठाता जीवात्मन् ! (उग्रः) वीर तू (वाजेषु) संग्रामों में (सहस्रप्रधनेषु च) तथा सहस्रों प्रकृष्ट धन जिनमें प्राप्त होते हैं, ऐसे चक्रवर्ती-राज्य-साधक महायुद्धों में (उग्राभिः) अत्यन्त उत्कृष्ट (ऊतिभिः) रक्षाओं से (नः) हमारी (रक्ष) रक्षा कर ॥३॥

भावार्थ : मनुष्य का आत्मा यदि बलवान् है तो उसे कोई भी पराजित नहीं कर सकता ॥३॥