Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/809

त्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः। त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥८०९

Veda : Samveda | Mantra No : 809

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २३४ क्रमाङ्क पर परमेश्वर और राजा के पक्ष में व्याख्यात हुई थी। यहाँ परमात्मा और जीवात्मा का आह्वान है।

पदपाठ : त्वाम् ।इत् ।हि ।हवामहे ।सातौ ।वाजस्य ।कारवः ।त्वाम् ।वृत्रेषु ।इन्द्र ।सत्पतिम् ।सत् ।पतिम् ।नरः ।त्वाम् ।काष्ठासु ।अर्वतः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमात्मन् वा जीवात्मन् ! (कारवः) कर्मशूर हम (वाजस्य) संग्राम की (सातौ) प्राप्ति होने पर (त्वाम् इत् हि) तुझे ही (हवामहे) पुकारते या उद्बोधन देते हैं। (वृत्रेषु) शत्रुओं वा विघ्नों के उमड़ने पर (सत्पतिम्) सज्जनों के पालनकर्ता (त्वाम्) तुझे ही पुकारते या उद्बोधन देते हैं। (नरः) सभी मनुष्य (काष्ठासु) दिशाओं में (अर्वतः) हिंसक शत्रु से रक्षार्थ (त्वाम्) तुझे ही पुकारते या उद्बोधन देते हैं ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा की कृपा से और आत्मोद्बोधन से सभी विघ्न और सभी शत्रु क्षण भर में पराजित किये जा सकते हैं ॥१॥