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Samveda/816

जघ्निर्वृत्रममित्रियसस्निर्वाजं दिवेदिवे। गोषातिरश्वसा असि॥८१६

Veda : Samveda | Mantra No : 816

In Hindi:

ऋषि : अहमीयुरांगिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर और आचार्य का वर्णन है।

पदपाठ : जघ्रिः ।वृत्रम् ।अमित्रियम् ।अ ।मित्रियम् ।सस्निः ।वाजम् ।दिवेदिवे ।दिवे ।दिवे ।गोषातिः ।गो ।सातिः ।अश्वसाः ।अश्व ।साः ।असि॥

पदार्थ : हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता सद्बुद्धिप्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! आप (आमित्रियम्) शत्रु से आनेवाले (वृत्रम्) पाप के (जघ्निः) नष्ट करनेवाले, (दिवेदिवे) प्रतिदिन (वाजम्) बल को (सस्निः) शुद्ध करनेवाले, (गोषातिः) भूमियों, गायों वा वाणियों के दाता और (अश्वसाः) घोड़ों वा प्राणों के दाता (असि) हो ॥२॥

भावार्थ : जगदीश्वर के समान गुरु भी पाप आदियों का विनाशक, आत्मबल, मनोबल, बुद्धिबल, चित्तबल आदि को पवित्र करनेवाला, समस्त वाङ्मय को पढ़ानेवाला और प्राणों को परिष्कृत करनेवाला होवे ॥२॥