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Samveda/862

यद्द्याव इन्द्र ते शतशतं भूमीरुत स्युः। न त्वा वज्रिन्त्सहस्रसूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी॥८६२

Veda : Samveda | Mantra No : 862

In Hindi:

ऋषि : पुरुहन्मा आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २७८ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के महत्त्व विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : यत् ।द्यावः ।इन्द्र ।ते ।शतम् ।शतम् ।भूमीः ।उत्त ।स्युः ।न ।त्वा ।वज्रिन् ।सहस्रम् ।सूर्या ।अनु ।न ।जातम् ।अष्ट ।रोदसी ।इति॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) शूरवीर जीवात्मन् ! (यत्) यदि (ते) तेरे सम्मुख (द्यावः) द्युलोक (शतम्) संख्या में सौ (उत) और (भूमीः) भूमियाँ भी (शतम्) संख्या में सौ (स्युः) हो जाएँ और (सूर्याः) सूर्य (सहस्रम्) हजार हो जाएँ, तो भी हे (वज्रिन्) वज्रधारी के समान शत्रुओं का प्रतिरोध करने में समर्थ जीवात्मन् ! वे (त्वा) तेरी (न अनु) महिमा को नहीं पा सकते (न) न ही (रोदसी) धरती-आसमान के बीच (जातम्) उत्पन्न कोई भी वस्तु (अष्ट) तेरी महिमा को पा सकती है। [अन्यत्र जीवात्मा स्वयं अपनी महिमा उद्घोषित करता हुआ कहता है—“मैं इन्द्र हूँ, मैं कभी धन को हार नहीं सकता। मैं कभी मरता नहीं” (ऋ० १०।४८।५)] ॥१॥यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जो जीवात्मा अजर, अमर, और चेतन है, उसकी महिमा को सौ, हजार, लाख, करोड़ गुणा भी होकर ये जड़ सूर्य, पृथिवी आदि प्राप्त नहीं कर सकते ॥१॥