Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/877

अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः। मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः (टु)।।॥८७७

Veda : Samveda | Mantra No : 877

In Hindi:

ऋषि : पवित्र आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : तृतीय ऋचा की पूर्वार्चिक में ५१६ क्रमाङ्क पर परमात्मारूप सोम के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ सोम का वर्णन सूर्यरूप में दर्शाते हैं।

पदपाठ : अरुरुचत् ।उषसः ।पृश्निः ।अप्रियः ।उक्षा ।मिमेति ।भुवनेषु ।वाजयुः ।मायाविनः ।ममिरे ।अस्य। मायया ।नृचक्षसः ।नृ ।चक्षसः ।पितरः ।गर्भम् ।आ ।दधुः॥

पदार्थ : यह (अग्रियः) आगे जानेवाला (पृश्निः) सूर्यरूप पवमान सोम (उषसः) उषाओं को (अरूरुचत्) चमकाता है। यह (उक्षा) वर्षाजल से सींचनेवाला सूर्य (भुवनेषु) भूमण्डलों में (वाजयुः) दूसरों को अन्न देना चाहता हुआ (मिमेति) बादल के जल को नीचे फेंकता है। (अस्य) इस सूर्य के ही (मायया) कर्म से (मायाविनः) कर्मयुक्त होते हुए वायु, जल, बिजली आदि (ममिरे) पदार्थों का निर्माण करते हैं और इस सूर्य के ही कर्म से (नृचक्षसः) मनुष्यों को प्रकाश देनेवाली (पितरः) पालक किरणें (गर्भम् आदधुः) ओषधी आदियों में गर्भ स्थापित करती हैं ॥३॥

भावार्थ : सौरमण्डल में उषा का प्रादुर्भाव, जल की वर्षा, बिजली चमकना, वायु का चलना, बीजों का अङ्कुरित होना आदि जो कुछ भी कर्म है, वह सब सूर्य के द्वारा ही किया जाता है। इस रूप में उसका महत्त्व जानकर उसका उपयोग शिल्प आदि में करना चाहिए। सूर्य में भी सब शक्ति परमात्मा की ही दी हुई है, इस कारण सूर्य का भी सूर्य परमात्मा है, यह भी जानना चाहिए ॥३॥चतुर्थ अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥