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Samveda/880

तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृक्षु सासहिम्। उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्॥८८०

Veda : Samveda | Mantra No : 880

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३८३ पर परमेश्वर के गुण-कर्मों के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ परमेश्वर, आचार्य और राजा का विषय वर्णित है।

पदपाठ : तम् ।ते ।मदम् ।गृणिमसि ।वृषणं ।पृक्षु ।सासहिम् ।उ ।लोककुत्नुम् ।लोक ।कृत्नुम् ।अद्रिवः ।अ ।द्रिवः ।हरिश्रियम् ।हरि ।श्रियम्॥

पदार्थ : हे (अद्रिवः) किसी से विदारण न किये जा सकनेवाले तथा स्वयं दोषों और शुत्रओं का विदारण करनेवाले परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (ते) आपके (तम्) उस प्रसिद्ध (मदम्) आनन्दप्रद ज्ञान वा बल की हम (गृणीमसि) स्तुति करते हैं, जो ज्ञान वा बल (वृषणम्) सुख आदि की वर्षा करनेवाला, (पृक्षु) देवासुरसंग्रामों में (सासहिम्) अतिशय रूप से असुरों का पराभव करनेवाला, (उ) और (हरिश्रियम्) मनोहर शोभावाला है ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा के समान आचार्य और राजा का भी ज्ञान वा बल अत्यधिक विशाल, प्रजाओं और शिष्यों को सुख देनेवाला, विपत्तियों का विदारण करनेवाला, कीर्ति देनेवाला और उज्ज्वल होवे ॥१॥