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Samveda/890

पवमान रसस्तव मदो राजन्नदुच्छुनः। वि वारमव्यमर्षति॥८९०

Veda : Samveda | Mantra No : 890

In Hindi:

ऋषि : अहमीयुरांगिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा और आचार्य के विषय का कथन है।

पदपाठ : पवमान। रसः ।तव ।मदः ।राजन् ।अदुच्छुनः ।अ ।दुच्छुनः ।वि ।वारम् ।अच्यम् ।अर्षति॥

पदार्थ : हे (पवमान) जीवन को पवित्र करनेवाले (राजन्) तेजस्वी परमात्मन् वा आचार्य ! जो (तव) आपका (अदुच्छुनः) दुर्गति तथा दुःख न उत्पन्न करनेवाला, (मदः) उत्साहकारी (रसः) आनन्दरस वा ज्ञानरस है, वह (अव्यम्) अविनश्वर, (वारम्) दोषनिवारक आत्मा को (वि अर्षति) विविध रूप में प्राप्त होता है ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर वा आचार्य से प्रस्रुत आनन्दरस वा विज्ञानरस को प्राप्त करके मनुष्य का आत्मा कृतार्थ हो जाता है ॥२॥